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बुधवार, 29 अगस्त 2012

"ससुराल है बेड़ियों की तरह" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


जिन्दगी चल रही चिमनियों की तरह।
बेटियाँ पल रही कैदियों की तरह।।

लाडलों के लिए पूरे घर-बार हैं,
लाडली के लिए संकुचित द्वार हैं,
भाग्य इनको मिला कंघियों की तरह।
बेटियाँ पल रही कैदियों की तरह।।

रंक माता पिता की हैं मुश्किल बढ़ी,
ताड़ सी पुत्रियों की हैं चिन्ता बड़ी,
भूख नर की बढ़ी भेड़ियों की तरह।
बेटियाँ पल रही कैदियों की तरह।।

शादियों में बहुत माँग जर की बढ़ी,
नोट की गड्डियों पर नजर हैं गड़ी,
रोग है बढ़ रहा कोढ़ियों की तरह।
बेटियाँ पल रही कैदियों की तरह।।

ये ही पीड़ा हृदय में रहेगी सदा,
लेखनी दर्द इनका लिखेगी सदा,
इनकी ससुराल है बेड़ियों की तरह।
बेटियाँ पल रही कैदियों की तरह।।

11 टिप्‍पणियां:

  1. उम्दा सोच के साथ खूबसूरत प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  2. सजीव चित्रण शास्त्री सर!
    मगर, हम अगर कोशिश करें तो..~

    आएँगे हम-आप जैसे ही आगे...छुड़ाने बेटियों को...
    जो जी रही हैं.... क़ैदियों की तरह...,
    बनाएँगे उनको तलवार और ढाल भी.. उन्हीं की...
    देकर ऊँची शिक्षा, पहुँचाएँगे उन्हें ऊँचे मुक़ाम पर...!
    करेंगे ससुराल क्या..दुनिया में भी ये साबित....
    " बेटी हमारी 'नहीं' मजबूर...बेटी है हमारे 'माथे का गुरूर' ....!" :-)
    ~ सादर !!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. रंक माता पिता की हैं मुश्किल बढ़ी,
    ताड़ सी पुत्रियों की हैं चिन्ता बड़ी,
    भूख नर की बढ़ी भेड़ियों की तरह।
    बेटियाँ पल रही कैदियों की तरह।।
    ye vastav me chinta kee bat hai.nice presentation.

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी पोस्ट 30/8/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें

    चर्चा - 987 :चर्चाकार-दिलबाग विर्क

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी पोस्ट 30/8/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें

    चर्चा - 987 :चर्चाकार-दिलबाग विर्क

    उत्तर देंहटाएं
  6. भूख नर की बढ़ी भेड़ -इयों की तरह ,.समस्या मूलक रचना ...मार्मिक ,कारुणिक ,शर्मसार करती सारी कायनात को
    बढ़िया प्रस्तुति है कृपया यहाँ भी पधारे -
    ram ram bhai
    बृहस्पतिवार, 30 अगस्त 2012
    अस्थि-सुषिर -ता (अस्थि -क्षय ,अस्थि भंगुरता )यानी अस्थियों की दुर्बलता और भंगुरता का एक रोग है ओस्टियोपोसोसिस
    http://veerubhai1947.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  7. कलम से सच निकल कर आया है
    बहुत सी जगह पर ऎसा पाया है
    बेटियाँ खुद अपनी किस्मत बनायेंगी
    मुश्किल की डगर से निकल कर आयेंगी
    हौसला उनका आसमान में
    हम आप की सोच ले जायेंगी !

    उत्तर देंहटाएं
  8. उफ़ ………बेटियों के दर्द को बहुत संजीदगी से संजोया है।

    उत्तर देंहटाएं
  9. सही में,"बेटियाँ पल रही कैदियों की तरह"
    उनकी हालात पर आपकी कलम की पीड़ा....अतिसुंदर |

    उत्तर देंहटाएं
  10. यथार्थ का आईना दिखती सार्थक पोस्ट...आज की ज़िंदगी का एक कड़वा सच आभार...

    उत्तर देंहटाएं

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