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गुरुवार, 9 अगस्त 2012

"ग़ज़ल-उल्फत का खेतों में बिखरा ख़जाना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


नहीं दिल्लगी कोई दिल को लगाना
मुहब्बत को करके, कठिन है निभाना

सूरत छिपी हैं मुखौटों के पीछे
मासूम चेहरों से धोखा न खाना

बाहर से नाजुक हैं भीतर से पत्थर
अगर हो सके तो ज़िगर को बचाना

उमड़ते हैं ज़ज़्बात बनते हैं मिसरे
आसां नहीं उनको गाकर सुनाना

काँटों भरी है डगर आशिकी की
समझ-बूझकर ही कदम को बढ़ाना

मुहब्बत का कोई नहीं रूप होता
उल्फत के जंगल में बिखरा ख़जाना

11 टिप्‍पणियां:

  1. उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बाहर से नाजुक हैं भीतर से पत्थर
    अगर हो सके तो ज़िगर को बचाना....बहुत ही खूब ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. फैला है चारों ओर यही खजाना..हर एक के लिये..

    उत्तर देंहटाएं
  4. काँटों भरी है डगर आशिकी की
    समझ-बूझकर ही कदम को बढ़ाना......यहाँ जो भी आये उठा करके जोखिम ,है ताबूत उनका पड़ा है गढ़ाना ..बढ़िया प्रस्तुति है भाई साहब .जन्म अष्टमी मुबारक .कृपया यहाँ भी देखें -
    बृहस्पतिवार, 9 अगस्त 2012
    औरतों के लिए भी है काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा प्रणाली
    औरतों के लिए भी है काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा प्रणाली

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुंदर
    क्या बात है
    कम ही ऐसी रचनाएं पढने को मिलती हैं

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत खूब,,,बेहतरीन गजल,,,,

    श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएँ
    RECENT POST ...: पांच सौ के नोट में.....

    उत्तर देंहटाएं
  7. दमदार है
    असरदार है
    'रूप' के पास
    खजानों की
    भरमार है!!

    उत्तर देंहटाएं
  8. जिगर तो कठोर व नरम दोनो प्रकार का होता है पर समय विशेष की भावनाये उसे उसके अनुसार ही बना देती है मोहब्‍बत तो हमेश सभी को पिघला देती हे
    आपको भी जन्‍माष्‍टमी की शुभकामनाये
    यूनिक तकनीकी ब्लाग

    उत्तर देंहटाएं

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