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शनिवार, 25 अगस्त 2012

"हमें फुर्सत नहीं मिलती" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


वतन के गीत गाने की, हमें फुर्सत नहीं मिलती।
नये पौधे लगाने की, हमें फुर्सत नहीं मिलती।।

सुमन खिलते हुए हमने, मसल कर रख दिये सारे,
मिटे रिश्ते बनाने की, हमें फुर्सत नहीं मिलती।

मुहब्बत में अगर दम है, निभाओ आख़िरी दम तक,
लगन सच्ची लगाने की, हमें फुर्सत नहीं मिलती।

बनाओ महल तुम बेशक, उजाड़ो झोंपड़ी को मत,
रोते को हँसाने की, हमें फुर्सत नहीं मिलती।

सुबह उठकर कबाड़ा बीनते हैं, दुधमुहे बच्चे,
उन्हें पढ़ने-लिखाने की, हमें फुर्सत नहीं मिलती।

बिगाड़ा रूप हमने ही, वतन की लोकशाही का,
मेहनत से कमाने की, हमें फुर्सत नहीं मिलती।

17 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत उम्दा रचना। सच का एक आइना प्रस्तुत किया है आपने।
    प्रतीक संचेती

    उत्तर देंहटाएं
  2. बनाओ महल तुम बेशक, उजाड़ो झोंपड़ी को मत,
    रोते को हँसाने की, हमें फुर्सत नहीं मिलती।

    सुबह उठकर कबाड़ा बीनते हैं, दुधमुहे बच्चे,
    उन्हें पढ़ने-लिखाने की, हमें फुर्सत नहीं मिलती।

    ्सच्चाई को प्रस्तुत करती उम्दा रचना

    उत्तर देंहटाएं
  3. रैपर टाफ़ी का दिखा, दीखे छिलके सेब |
    भारत सुन्दर सा लिखा, कचड़े में न ऐब |
    कचड़े में न ऐब, कतरने टुकड़े बीने |
    पड़ा कबाड़ा ढेर, कबाड़ी बचपन छीने |
    कड़े नियम कानून, लिखाते संसद पेपर |
    खाँय करिंदे माल, बटोरें बच्चे रैपर ||

    उत्तर देंहटाएं
  4. सही सन्देश देती अच्छी कविता , अपने से ही किसी को फुर्सत नहीं जो गैर की सोचे !

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह बहुत खूब

    हम को अपनी ही सोच बदलने की फुर्सत नहीं मिलती ...वाह करना ...दाद देना कितना आसन हैं ना ...उतना ही मुश्किल हैं खुद को बदलना ..

    उत्तर देंहटाएं
  6. काश फुर्सत मिले, सुन्दर कविता..

    उत्तर देंहटाएं
  7. आपकी किसी पुरानी बेहतरीन प्रविष्टि की चर्चा मंगलवार २८/८/१२ को चर्चाकारा राजेश कुमारी द्वारा चर्चामंच पर की जायेगी मंगल वार को चर्चा मंच पर जरूर आइयेगा |धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  8. वतन के नगमे गाने की..,
    शाख्समर उगाने की..,

    समन-ए-गुल शुआ हमने, मसल्सल मसल दिया हमने..,
    कोई और गुल खिलाने की..,

    मुहब्बत में है गर अदद दम वफादार हो आखिर दम..,
    मगर ज़िगर लगाने की हमें फुर्सत नहीं मिलती.....

    Saman = (fa.)chameli

    उत्तर देंहटाएं
  9. शास्त्री सर! गंभीर सच है ये और दुखदायी भी !

    बहुत गंभीर मसला है...दर्द भी दिल में होता है..
    उंगली सब उठाते हैं, क़दम न कोई उठता है....
    बचाएँ मासूम कलियाँ जो ...समय से पहले मुरझाती..
    न जाने क्यों ज़माने में....हमें फ़ुर्सत नहीं मिलती... :(
    ~सादर!!!

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत सारगर्भित रचना. हमें न अपनों के लिए फुर्सत है न देश समाज के लिए...
    सुमन खिलते हुए हमने, मसल कर रख दिये सारे,
    मिटे रिश्ते बनाने की, हमें फुर्सत नहीं मिलती।
    विचारपूर्ण रचना, बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  11. अत्यंत सार्थक एवं संदेशात्मक रचना, दुआ करता हूँ की यह अपील देश के कोने तक पहुचे

    उत्तर देंहटाएं

  12. सुबह उठकर कबाड़ा बीनते हैं, दुधमुहे बच्चे,
    उन्हें पढ़ने-लिखाने की, हमें फुर्सत नहीं मिलती।
    इस पर भी बहस करवा देंगे ये संसद में .....बढ़िया पोस्ट .कृपया यहाँ भी पधारें -
    शनिवार, 25 अगस्त 2012
    काइरोप्रेक्टिक में भी है समाधान साइटिका का ,दर्दे -ए -टांग का
    काhttp://veerubhai1947.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  13. बहुत सुंदर !

    अपनी अपनी फुर्सतों
    में मसरूफ इतना
    कि अब आदमी को
    अपने लिये भी
    फुरसत नहीं मिलती
    आप ने लिखे डाली
    इन की किस्मत
    उसे इसको देखने की भी
    फुरसत नहीं मिलती !

    उत्तर देंहटाएं
  14. बहुत प्रेरणास्पद सारगर्भित रचना तस्वीर को परिभाषित करती हुई

    उत्तर देंहटाएं

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