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सोमवार, 29 अप्रैल 2013

‘‘मेरा बस्ता कितना भारी’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


मेरा बस्ता कितना भारी।
बोझ उठाना है लाचारी।।

मेरा तो नन्हा सा मन है।
छोटी बुद्धि दुर्बल तन है।।

पढ़नी पड़ती सारी पुस्तक।
थक जाता है मेरा मस्तक।।

रोज-रोज विद्यालय जाना।
बड़ा कठिन है भार उठाना।।

कम्प्यूटर का युग अब आया।
इसमें सारा ज्ञान समाया।।

मोटी पोथी सभी हटा दो।
बस्ते का अब भार घटा दो।।

एक पुस्तिका पेन चाहिए।
हमको मन में चैन चाहिए।।
कम्प्यूटर जी पाठ पढ़ायें।
हम बच्चों का ज्ञान बढ़ाये।

इतने से चल जाये काम।
छोटा बस्ता हो आराम।।

17 टिप्‍पणियां:

  1. हमारे देश कि स्कूली शिक्षा के तरीके पर प्रहार करती सुन्दर बाल कविता !!

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर ,बच्चों की तकलीफे बताती रचना !
    latest postजीवन संध्या
    latest post परम्परा

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर प्रस्तुति.... स्कूली शिक्षा के बोझ तले दबे बच्चे ..सब को विचार करना होगा.

    उत्तर देंहटाएं

  4. एक पुस्तिका पेन चाहिए।
    हमको मन में चैन चाहिए।।

    बहुत बढ़िया प्रस्तुति प्रासंगिक अर्थ लिए .अधुनातन सन्दर्भ लिए .

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर बाल कविता | जल्दी से छुटियाँ हो जाएँ तो इस कष्ट से निजात मिले बच्चों को |

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

    उत्तर देंहटाएं
  6. काश!! बच्चों का दर्द समझे कोई!!

    उत्तर देंहटाएं
  7. बिलकुल बच्चों के मन की कही...... सुंदर बाल कविता ..

    उत्तर देंहटाएं
  8. आज बच्चों का बस्ता सच में भारी होता जा रहा है,बहुत ही सुन्दर बाल कविता,आभार आदरणीय.

    उत्तर देंहटाएं
  9. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ...सादर।

    उत्तर देंहटाएं
  10. शिक्षा प्रणाली ने बच्चो पर बोझ बढ़ा दिया है ..........पढ़ाई एक आफत नज़र आती है ...........गए वो दिन जब बच्चे खेल -खेल में पढ़ते थे ...............सुन्दर वर्णन आपका ..........

    उत्तर देंहटाएं

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