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रौशनी का सिलसिला कैसे
चलेगा?
आँधियों में दीप अब कैसे
जलेगा?
कामनाओं का प्रबल सैलाब जब बहने लगा,
भावनाओं का सबल आलाप ये
कहने लगा,
नेह का बिरुआ यहाँ कैसे
पलेगा?
आँधियों में दीप अब कैसे
जलेगा?
लोच है जिनके बदन में, वो सभी रह जायेंगे,
जो तने-अकड़े हुए हैं, वो सभी ढह जायेंगे,
आचरण-व्यवहार अब कैसे
फलेगा?
आँधियों में दीप अब कैसे
जलेगा?
आँधियों का दौर है, क्यों खेलते हो आग से,
मन-बदन शीतल बनाना, फाल्गुन की फाग से,
रंग के बिन दिवस अब कैसे
ढलेगा?
आँधियों में दीप अब कैसे
जलेगा?
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इस आँधियों के दौर में भी दीप तो जलाना ही पडेगा,बहुत ही सशक्त रचना,आभार आदरणीय.
जवाब देंहटाएंwaah behad shashakt rachna , shashtri ji hardik badhai
हटाएंwaah behad shashakt rachna , shashtri ji hardik badhai
हटाएंलोच है जिनके बदन में, वो सभी रह जायेंगे,
जवाब देंहटाएंजो तने-अकड़े हुए हैं, वो सभी ढह जायेंगे,
आचरण-व्यवहार अब कैसे फलेगा?
आँधियों में दीप अब कैसे जलेगा?………………सुन्दर संदेश देती अभिव्यक्ति
सशक्त रचना,आभार.
जवाब देंहटाएंदीप को तो जलाना ही पडेगा..…सुन्दर संदेश देती सशक्त रचना ,,आभार
जवाब देंहटाएंbahut hee sundar guru jee...!!!!
जवाब देंहटाएंलोच है जिनके बदन में, वो सभी रह जायेंगे,
जवाब देंहटाएंजो तने-अकड़े हुए हैं, वो सभी ढह जायेंगे,...
सच कहा है ... झुकने से टूटने से बच जाते हैं ...
गहन मनन, बहुत भावपूर्ण, बधाई.
जवाब देंहटाएंvicharniy prastuti, kaise ?ka gambhir prashn khada karti sundar prastuti
जवाब देंहटाएंसत्य सटीक एवं सुन्दर आदरणीय गुरुदेव श्री बेहद सुन्दर हार्दिक बधाई.
जवाब देंहटाएंलोच है जिनके बदन में, वो सभी रह जायेंगे,
जवाब देंहटाएंजो तने-अकड़े हुए हैं, वो सभी ढह जायेंगे,
आचरण-व्यवहार अब कैसे फलेगा?
आँधियों में दीप अब कैसे जलेगा?
......सबसे सुन्दर पंक्तियाँ .....सुन्दर गीत...
जो झुकेंगे वो बच जायेंगे ,जो तन कर खड़े रहेंगे वो टूटेंगे
जवाब देंहटाएंlatest post सुहाने सपने
लोच है जिनके बदन में, वो सभी रह जायेंगे,
जवाब देंहटाएंजो तने-अकड़े हुए हैं, वो सभी ढह जायेंगे,.. क्या बात कही है शास्त्री जी ,, बहुत खूब!
दीप अगर बुझ गया तो अंधकार और गहरा जाएगा और आंधियों में कौन कहां पहुंच जाएगा कहा नहीं जा सकता।
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर गुरूदेव!
इतनी सुन्दर रचना के लिए आपका आभार!
सुन्दर शानदार प्रस्तुति हेतु बधाई आपको
जवाब देंहटाएंआचरण में रिक्तता है, चिन्ता सामयिक है।
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