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बुधवार, 10 अप्रैल 2013

"मैं तब-तब पागल होता हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


जब मन्दिर-मस्जिद जलते हैं,मैं तब-तब पागल होता हूँ।
जब जूते-चप्पल चलते हैं,  मैं तब-तब पागल होता हूँ।।

त्योहारों की परम्परा में, दीन-धर्म जब आता है,
भाषण के शोले दाग जहाँ दंगा भड़काया जाता है,
जब आग उगलते हैं मौसम, मैं तब-तब पागल होता हूँ।
जब जूते-चप्पल चलते हैं,  मैं तब-तब पागल होता हूँ।।

कूड़ा-कचरा बीन जहाँ पर, बालक घर-बार चलाते हैं,
पढ़ने-लिखने की आयु में, जीवन को वृथा गँवाते हैं,
जब बचपन आँखें मलते हैं,मैं तब-तब पागल होता हूँ।
जब जूते-चप्पल चलते हैं,  मैं तब-तब पागल होता हूँ।।

जिसको होता दर्द, वही तो उसकी पीड़ा को जाने,
जिसको कभी नही होता, वो कैसे उसको पहचाने,
जब सर्प बाँह में पलते हैं,मैं तब-तब पागल होता हूँ।
जब जूते-चप्पल चलते हैं,  मैं तब-तब पागल होता हूँ।।

लोकतन्त्र का जहाँ खुला उपहास उड़ाया जाता हो,
परिवारतन्त्र को राजतन्त्र का रुधिर चढ़ाया जाता हो,
जब ज़ाम सदन में ढलते हैं,मैं तब-तब पागल होता हूँ।
जब जूते-चप्पल चलते हैं,  मैं तब-तब पागल होता हूँ।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. पागल कर देने वाली स्थिति ही आ गयी है आदरणीय,आज देश की दुर्दशा देख रोना आता है.
    पांवों में नित चुभ रहे, राजनीति के शूल।
    ‘राज’ राज होकर रहा, गया नीतियां भूल॥

    उत्तर देंहटाएं
  2. विह्वल करते भाव ||
    आभार गुरूजी ||

    उत्तर देंहटाएं
  3. हर संवेदनशील इंसान की आज यही मनोदशा है सर जी ! बहुत उम्दा वर्णन किया आपने !

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी यह प्रस्तुति कल के चर्चा मंच पर है
    कृपया पधारें

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत अच्छी प्रस्तुति डा. साहब

    उत्तर देंहटाएं
  6. सच में क्रोध बहुत आता है,
    झूठ अगर चिल्लाता है।

    उत्तर देंहटाएं
  7. देख कर दिमाग सच में असंतुलित होने लगता है!

    उत्तर देंहटाएं
  8. लोकतन्त्र का जहाँ खुला उपहास उड़ाया जाता हो,
    परिवारतन्त्र को राजतन्त्र का रुधिर चढ़ाया जाता हो

    उत्तर देंहटाएं
  9. वाह वाह …………शानदार प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  10. क्या बात, बहुत सुंदर रचना
    बहुत सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  11. प्रभावी अभिव्यक्ति!
    सच में! ऐसी स्थितियाँ पागल ही कर देतीं हैं....
    ~सादर!!!

    उत्तर देंहटाएं

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