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मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

"ग़ज़ल-मुखौटे मोम के" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


रास हमको आ रहे हैं, अब मुखौटे मोम के
कुर्सियों को भा रहे हैं, अब मुखौटे मोम के

सुबह को कुछ और कहते, शाम को कुछ और हैं
देश को तो खा रहे हैं, अब मुखौटे मोम के

खौफ क्यूँ खायें भला, कानून का बहरूपिये
न्याय करने जा रहे हैं, अब मुखौटे मोम के

राम से रहमान को लड़वा रहे हैं शान से
चमन को लुटवा रहे हैं, अब मुखौटे मोम के

ये कभी तो कृष्ण दिखते, कंस दिखते हैं कभी
 ज़ुल्म सब पर ढा रहे हैं, अब मुखौटे मोम के

आदमी का रूप धर कर, भेड़िए काज़ी बने
माल घर में ला रहे हैं, अब मुखौटे मोम के 

14 टिप्‍पणियां:

  1. सच्चाई का दर्पण दिखाती गजल सुन्दर लगी.....

    उत्तर देंहटाएं
  2. "मुखौटा" बच्चों के लिये एक खेल का साधन परन्तु जैसे जैसे आयु बढती है और जीवन में व्यवहारिकता आने लगती है वैसे वैसे मनुष्य का चरित्र सहज न रह कर मुखौटों का मोहताज हो जाता है.सार्थक संदेस देती बेहतरीन रचना.

    उत्तर देंहटाएं

  3. नेतायों के चरित्र चित्रण करती गजल - उम्दा प्रस्तुति !
    LATEST POSTसपना और तुम

    उत्तर देंहटाएं
  4. सच आदमी के आस मुखौटों की कोई कमी नहीं ....
    बहुत बढ़िया

    उत्तर देंहटाएं
  5. ताउम्र इन्ही मुखोटों के सहारे तो जीता है इंसान.....
    असली चेहरा तो पता नहीं कितने मुखोटों के पीछे छिपा रह जाता है....
    बहुत सुंदर रचना सर.....

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज बुधवार (10-04-2013) के "साहित्य खजाना" (चर्चा मंच-1210) पर भी होगी! आपके अनमोल विचार दीजिये , मंच पर आपकी प्रतीक्षा है .
    सूचनार्थ...सादर!

    उत्तर देंहटाएं
  7. वर्तमान परिस्थितियों का सार्थक चित्रण.

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाकई क्या लिखा है आपने, दिल से आपको मुबारक बाद और सलाम।

    उत्तर देंहटाएं
  9. गर्मी होगी,
    पिघल जायेंगे,
    यही मुखौटे मोम के।

    उत्तर देंहटाएं

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