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रविवार, 7 अप्रैल 2013

"हमारा राजा हमीं को खाकर जीवित है.." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

कहते हैं,
मनुष्य योनी,
श्रेष्ठ कहलाती है,
तभी तो, पतन की ओर,
उन्मुख होती चली जाती है

श्रेष्ठता की
चरम सीमा,
मनुष्य,
जीव जन्तुओं का
बना रहा है कीमा

हे जीव-जन्तुओ!
तुम अपने राजा से
परिवाद क्यों नही करते?
न्याय की,
गुहार क्यों नही करते?

तभी इन निरीह जीवों की,
आवाज आती है,
जो हृदय को
हिला जाती है

लेकिन हमारी शिकायत
सुनेगा कौन?
अन्धेर नगरी में,
सभी तो हैं मौन

हमारा तो
अहित ही अहित है,
क्योंकि हमारा राजा भी तो,
हमीं को खाकर जीवित है।

13 टिप्‍पणियां:

  1. बिलकुल सही लिखे आदरणीय,इस अँधेरी नगरी में सभी मौन हैं.बहुत ही सार्थक संदेस देती बेहतरीन रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बिलकुल सही कहा ..बेहतरीन रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर शव्दों में आपने प्रस्तुत किया है यथार्त को बहुत बहुत धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  4. वर्तमान परिस्थिति का बहुत सुन्दरता से चित्रण किया है आपने, सुन्दर एवं सटीक आदरणीय बधाई स्वीकारें.

    उत्तर देंहटाएं
  5. bahut sundar sach kaha aapne ..... samaj ka darpan dikh raha hai har panktiyon me .saadar .

    उत्तर देंहटाएं
  6. वर्तमान परिस्थितियों का बहुत सुन्दर एवं सटीक चित्रण !!!

    RECENT POST: जुल्म

    उत्तर देंहटाएं
  7. भाग्य के हर परिवर्तन का पल पल प्रबल रहे |
    जीवन के उज्जवल पुष्कर में खिलते कमल रहें |
    पहले तो हर मौसम झंझावातों से ही बचा रहे-
    झंझावात अगर आयें तो,जीवन सफल रहे ||

    उत्तर देंहटाएं
  8. सुंदर चित्रण गुरु जी बधाई
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार (08 -04-2013) के चर्चा मंच 1208 पर लिंक की गई है कृपया पधारें.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है | सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  9. बेहद अर्थपूर्ण व्यंजना .शुक्रिया हमें चर्चा मंच के मयंक कौने में जगह देने के लिए .

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत बढ़िया .......शब्द नहीं है इसकी तारीफ़ के लिए

    उत्तर देंहटाएं

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