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शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

"खद्योतों का निर्वाचन.." (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

झूठे-वादे, कोरे-नारे, झूठा सब अपना-पन है।
तारों की महफिल में, खद्योतों का निर्वाचन है।

रंग-बिरंगे झण्डे फहराने की, सब में होड़ लगी है,
नेताओं के तन में खुजली, मन में कोढ़ लगी है,

रूखा-सूखा मत का भूखा, बिन पानी का ये घन है।
तारों की महफिल में, खद्योतों का निर्वाचन है।।

पाँच साल जम कर लूटा, अब लुट जाने के दिन हैं,
वोट बैंक की खातिर, जूतों से पिट जाने के दिन हैं,

कुर्सी की खातिर ये करता, पूजा, हवन, भजन है।
तारों की महफिल में, खद्योतों का निर्वाचन है।

11 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (13 -4-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  2. सही चित्र खींचा है-
    झरीं नीम की पत्तियाँ (दोहा-गीतों पर एक काव्य) (ज)स्वर्ण-कीट)(१) मैली चमक
    हाथ में जुगनू पकड़ कर, मलिन हुआ ‘स्पर्श’ |
    ‘लोभ की मैली चमक’ से, उन्हें हुआ है हर्ष ||

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  3. bade satir khiadi hai,badi katil nigahe hai,samhal kar ham kaha jaye,jagah jahanuum me bhi n kahi hai

    उत्तर देंहटाएं
  4. जनता के चित में अज्ञानता इस प्रकार आच्छादित है कि
    नेता-मंत्री, जनता का सर्वस ही क्यों न लूट लें वो उन्हें वोट देंगे
    यदि नेता-मंत्री जनता के हाथ भी काट ले तो वे पैर से वोट देंगे
    यदि ये नेता पैर भी काट ले तो वो नाक से वोट देंगे.....

    उत्तर देंहटाएं
  5. रूखा-सूखा मत का भूखा, बिन पानी का ये घन है।
    तारों की महफिल में, खद्योतों का निर्वाचन है।।

    Bhaut shaandaar !

    उत्तर देंहटाएं
  6. बिलकुल ठीक है, खद्योतों का ही जमाना है।

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  7. बिलकुल सही कहा गुरु जी अब सब समस्याओं का समाधान करने का दिखावा किया जाएगा
    ''नवरात्र ''भाग 1

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत बढ़िया कटाक्ष के तीक्ष्ण प्रहार करती जनता को जागरूक करती पोस्ट हार्दिक बधाई आपको

    उत्तर देंहटाएं

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