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गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

"दुनिया वक्र है..." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

हर रोज 
सुबह आयेगी 
शाम ढलेगी  
रात हो जायेगी 
और फिर होगा 
नया सवेरा  
मिट जायेगा 
धरा से अंधेरा 

लेकिन... 
मन के कोटर में 
न कभी धूप आयेगी 
और न कभी सवेरा होगा 
अंधेरा था 
और अंधेरा ही रहेगा 
फिर भी..
क्यों करते हैं हम 
ख़त्म न होने वाला
ये इन्तजार 
सोचते हैं 
शायद हो जाये 
कोई चमत्कार 

इसी अभिलाषा में 
तो जी रहे हैं 
और दवा के नाम पर 
गरल के घूँट पी रहे हैं 

नहीं रहा 
आह! में असर 
दुआएँ भी 
हो गयीं हैं बेअसर 

चाह तो है 
पर राह नहीं है 
जिस्म को
रूह की परवाह नहीं है 

देह की
बुझ जाती है पिपासा 
मगर अधूरी रहती है
आत्मा की अभिलाषा 

यही तो 
जीवन का चक्र है 
इसीलिए
दुनिया वक्र है...!

17 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  2. नव संवत्सर की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें !!

    उत्तर देंहटाएं
  3. गुरूदेव अति सुन्दर! बधाई इस सुन्दर रचना हेतु!

    उत्तर देंहटाएं
  4. नवसंवत्‍सर और नवरात्र की बधाई व शुभकामनाएं.....

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुन्दर प्रस्तुति | नवसंवत्सर की बहुत बहुत शुभकामनायें हम हिंदी चिट्ठाकार हैं

    BHARTIY NARI
    PLEASE VISIT .

    उत्तर देंहटाएं
  6. भावात्मक अभिव्यक्ति ह्रदय को छू गयी आभार नवसंवत्सर की बहुत बहुत शुभकामनायें नरेन्द्र से नारीन्द्र तक .महिला ब्लोगर्स के लिए एक नयी सौगात आज ही जुड़ें WOMAN ABOUT MANजाने संविधान में कैसे है संपत्ति का अधिकार-1

    उत्तर देंहटाएं
  7. नव संवत्सर की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ!!बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  8. आज नया रूप है लेकिन अच्‍छा है।

    उत्तर देंहटाएं
  9. नए वर्ष में नए अंदाज की कविता..

    उत्तर देंहटाएं
  10. सुन्दर प्रस्तुति इलाज़ है अपने आत्म स्वरूप की स्मृति में लौटना .हम कौन थे क्या हो गए .

    उत्तर देंहटाएं
  11. जिंदगी का पाठ पड़ा दिया गुरु जी
    http://guzarish66.blogspot.in/2013/04/1.html

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत बढ़िया रचना .....गहन दर्शन से पूर्ण ...
    आभार....

    उत्तर देंहटाएं

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