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बुधवार, 7 अप्रैल 2010

“क्षणिकाएँ” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

(1)

एक क्लिक में शुरू
एक क्लिक में खत्म
नेट की दोस्ती

(2)

बसन्त में बहार
झाड़ियों पर निखार
चार दिन की चाँदनी
फिर है अंधियार

(3)

सोलह सिंगार 

ऊब गया मन
सूखा सावन 
मुर्झाया सुमन

14 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी क्षणिकायें हैं डॉक्टर साहब ..लेकिन व्यंग्य में ही सही कुछ निराशा झलक रही है ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. एक क्लिक में शुरू
    एक क्लिक में खत्म
    नेट की दोस्ती

    दिलचस्प!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. सोलह सिंगार
    ऊब गया मन
    सूखा सावन
    मुर्झाया सुमन
    nice

    उत्तर देंहटाएं
  4. good

    bahut khub
    an

    waqy me acha laga aap ka chint

    shekhar kumawat

    http://kavyawani.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  5. सन्देश देती हुई क्षणिकाएं....आभार

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुते बढिया क्षणिकाएं.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  7. एक क्लिक में दोस्ती ...एक क्लिक में ख़त्म ...
    चार दिन की चांदनी ...फिर अँधेरी
    आभासी संसार की दोस्ती पर अच्छा व्यंग्य ...

    उत्तर देंहटाएं

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