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बुधवार, 21 अप्रैल 2010

“शीर्षकहीन!” ( डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक”)

आये थे हँसने-मुस्काने,

पीड़ा का सैलाब मिला!


आदाबों के भवसागर में,


नही अदब-आदाब मिला!



आज केवल मुखड़ा!

पूरा गीत कल को!

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही गहरे भाव के साथ आपने छोटा सा शानदार रचना प्रस्तुत किया है!

    उत्तर देंहटाएं
  2. rah gaye donon haath khali,
    jab se tere daman ka saath gaya.

    acha likha hai..

    उत्तर देंहटाएं

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