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मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

“मातृभाषा की अल्पना!” (गीतकार-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

कल्पना का सूर्य मन पर छा गया है।
अलख हमको भी जगाना आ गया है।।


मातृभाषा की सजा कर अल्पना,
रंग भरने को चली परिकल्पना,
भारती के गान गाना आ गया है।
अलख हमको भी जगाना आ गया है।।



मानसिकता को जगाने के लिए,
ज्ञान की सरिता बहाने के लिए,
अब हमें उत्सव मनाना आ गया है।
अलख हमको भी जगाना आ गया है।।



रश्मियों ने रूप हिन्दी का निखारा
सूर, तुलसीदास ने इसको सँवारा,
शब्द के पौधे उगाना आ गया है।
अलख हमको भी जगाना आ गया है।।



आरती के थाल अब सजने लगे,
तार वीणा के मधुर बजने लगे,
वन्दना अब गुनगुनाना आ गया है।
अलख हमको भी जगाना आ गया है।।






amarb copy
रचयिता:
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"
स्वर: श्रीमती अमर भारती

14 टिप्‍पणियां:

  1. कल्पना का सूर्य मन पर छा गया है।
    अलख हमको भी जगाना आ गया है।।
    ...सुन्दर, भावपुर्ण.....

    उत्तर देंहटाएं
  2. मानसिकता को जगाने के लिए,
    ज्ञान की सरिता बहाने के लिए,
    अब हमें उत्सव मनाना आ गया है।
    अलख हमको भी जगाना आ गया है।।

    अति सुन्दर शास्त्री जी

    उत्तर देंहटाएं
  3. मातृभाषा की सजा कर अल्पना,
    रंग भरने को चली परिकल्पना,
    शुभान अल्लाह!!

    उत्तर देंहटाएं
  4. मातृभाषा की सजा कर अल्पना,
    रंग भरने को चली परिकल्पना,
    भारती के गान गाना आ गया है ..

    देश प्रेम के रंग में रची अनुपम रचना ... बहुत ही सुंदर ...

    उत्तर देंहटाएं
  5. रश्मियों ने रूप हिन्दी का निखारा
    सूर, तुलसीदास ने इसको सँवारा,
    शब्द के पौधे उगाना आ गया है।
    अलख हमको भी जगाना आ गया है।।

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति....

    उत्तर देंहटाएं
  6. मानसिकता को जगाने के लिए,
    ज्ञान की सरिता बहाने के लिए,
    अब हमें उत्सव मनाना आ गया है।
    अलख हमको भी जगाना आ गया है।।
    बहुत ख़ूबसूरत पंक्तियाँ! शानदार और भावपूर्ण रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  7. bahut aachi lagi dhekh har .......
    meine aapne friends ko bhi dhikyae
    "BEST OF lUCK"

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुंदर, शुभकामनाएं.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं

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