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सोमवार, 26 अप्रैल 2010

“धन्य सपूत हो गया!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

तुमने अमृत बरसाया तो,
मैं कितना अभिभूत हो गया!
मन के सूने से उपवन में,
फिर बसन्त आहूत हो गया!

आसमान में बादल गरजा,
आशंका से सीना लरजा,
रिमझिम-रिमझिम पड़ीं फुहारें,
हरा-भरा फिर ठूठ हो गया!

चपला चम-चम चमक उठी है,
धानी धरती दमक उठी है,
खेतों में पसरी हरियाली,
मन प्रमुदित आकूत हो गया!

जब स्वदेश पर संकट आया,
सीमा पर वैरी मंडराया,
मातृ-भूमि की बलिवेदी पर
फिर से धन्य सपूत हो गया!

14 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर शब्द चयन के साथ बहुत ही सार्थक एवं लयबद्ध गीत ! अति सुन्दर !
    http://sudhinama.blogspot.com
    http://sadhanavaid.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  2. जब स्वदेश पर संकट आया,
    सीमा पर वैरी मंडराया,
    मातृ-भूमि की बलिवेदी पर
    फिर से धन्य सपूत हो गया!
    Bahut khoob !

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही सुन्दर और लयबद्ध गीत्।

    उत्तर देंहटाएं
  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत बढ़िया लगा! ख़ूबसूरत गीत!

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुन्दर
    शानदार
    जानदार रचना ................बधाई !

    - अलबेला खत्री

    उत्तर देंहटाएं
  7. तुमने अमृत बरसाया तो,
    मैं कितना अभिभूत हो गया!
    मन के सूने से उपवन में,
    फिर बसन्त आहूत हो गया!

    बहुत सुन्दर भाव...पुरी रचना ही बहुत अच्छी है...साथ ही प्रेरणादायक भी...

    उत्तर देंहटाएं
  8. "जब स्वदेश पर संकट आया,
    सीमा पर वैरी मंडराया,
    मातृ-भूमि की बलिवेदी पर
    फिर से धन्य सपूत हो गया!"


    सार्थक और प्रेरणादायक !

    उत्तर देंहटाएं
  9. वाह शास्‍त्रीजी, बारिश की बात कर दी, यहाँ तो बूंद-बूंद को तरस रहे हैं। लेकिन अन्‍त में देश भक्ति का जज्‍बा भर दिया आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  10. जब स्वदेश पर संकट आया,
    सीमा पर वैरी मंडराया,
    मातृ-भूमि की बलिवेदी पर
    फिर से धन्य सपूत हो गया

    वाह शास्त्री जी ... कितना अनुपम लिखा है .. शब्दों में ग़ज़बका आकर्षण है ...

    उत्तर देंहटाएं

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