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रविवार, 25 अप्रैल 2010

‘‘जरा सी बात’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

जरा सी बात में ही,
युद्ध होते हैं बहुत भारी।
जरा सी बात में ही,

क्रुद्ध होते हैं धनुर्धारी।।
जरा सी बात ही माहौल में,

विष घोल देती है।
जरा सी जीभ ही कड़ुए वचन,

को बोल देती है।।
मगर हमको नही इसका,

कभी आभास होता है।
अभी जो घट रहा कल को,

वही इतिहास होता है।।

17 टिप्‍पणियां:

  1. बिलकुल सही लिखा जी जरा सी बात कई बार बहुत अनर्थ कर देती है.
    धन्यवाद इस सुंदर कविता के लिये

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  2. बात तो जरा सी होती है पर हश्र ---

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सही कहा, तिल का हि ताड बनता है. जब बाद में गलत फ़हमियां दूर होती हैं तब बहुत पछतावा होता है. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह शास्त्री जी बहुत ही बेहतरीन पंक्तियां लिखी हैं आपने और आज के समय के अनुकूल भी एकदम सटीक । शुभकामनाएं आपको

    उत्तर देंहटाएं
  5. " samay ke saath likkhi rachana "

    ----eksacchai { AAWAZ }

    http://eksacchai.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  6. अभी जो घट रहा कल को,
    वही इतिहास होता है।।

    aacha sandesh..

    उत्तर देंहटाएं
  7. bahut hi badhiya rachna sir....ek hi saans me kavita khatm hoti hai ...par kai saanson tak chalti hai ...

    उत्तर देंहटाएं
  8. वही इतिहास होता है।
    बढिया परिभाषा इतिहास की।

    उत्तर देंहटाएं
  9. वाह्…………बहुत ही सुन्दर शब्दो के माध्यम से यथार्थ बोध करा दिया…………………गज़ब की प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  10. एकदम सही बात है।
    रहिमन जिह्वा बावरी कहिगै सरग पाताल,
    आपु तो कहि भीतर रही, जूती सहत कपाल।

    उत्तर देंहटाएं
  11. मगर हमको नही इसका,
    कभी आभास होता है।
    अभी जो घट रहा कल को,
    वही इतिहास होता है।।

    ये ज़रा सी बात ही ना जाने कितने युद्धों का कारण बनी है...शिक्षाप्रद रचना

    उत्तर देंहटाएं

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