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गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

“रचना बन जाया करती है!” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

जब कोई श्यामल सी बदली,
सपनों में छाया करती है!
तब होता है जन्म गीत का,
रचना बन जाया करती है!!


निर्धारित कुछ समय नही है,
कोई अर्चना विनय नही है,
जब-जब निद्रा में होता हूँ,
तब-तब यह आया करती है!
रचना बन जाया करती है!!


शोला बनकर आग उगलते,
कहाँ-कहाँ से  शब्द निकलते,
अक्षर-अक्षर मिल करके ही,
माला बन जाया करती है!
रचना बन जाया करती है!!


दीन-दुखी की व्यथा देखकर,
धनवानों की कथा देखकर,
दर्पण दिखलाने को मेरी,
कलम मचल जाया करती है!
रचना बन जाया करती है!!


भँवरे ने जब राग सुनाया,
कोयल ने जब गाना गाया,
मधुर स्वरों को सुनकर मेरी,
नींद टूट जाया करती है!
रचना बन जाया करती है!!


वैरी ने  हुँकार भरी जब,
धनवा ने टंकार करी तब,
नोक लेखनी की तब मेरी,
भाला बन जाया करती है!
रचना बन जाया करती है!!

22 टिप्‍पणियां:

  1. "दीन-दुखी की व्यथा देखकर,
    धनवानों की कथा देखकर,
    कलम मचल जाया करती है!
    रचना बन जाया करती है!!"

    बहुत खूब .....बहुत खूब !! बेहद उम्दा रचना बनी है !
    बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

    उत्तर देंहटाएं
  2. शोला बनकर आग उगलते,
    कहाँ-कहाँ से शब्द निकलते,
    अक्षर-अक्षर मिल करके ही,
    माला बन जाया करती है!
    रचना बन जाया करती है!!

    उम्दा रचना शास्त्री जी !

    उत्तर देंहटाएं
  3. वैरी ने हुँकार भरी जब,
    धनवा ने टंकार करी तब,
    नोक लेखनी की तब मेरी,
    भाला बन जाया करती है!
    रचना बन जाया करती है!!


    वाह । क्‍या खूब ही कहा है आपने। सच है कवि का अपना अलग ही संसार होता है जिसका वो खुद ही नियंता होता है।


    बहुत बहुत धन्‍यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  4. मयंक जी,
    रचना बहुत अच्छी लगी .
    नोक लेखनी की तब मेरी,
    भाला बन जाया करती है!
    - विजय

    उत्तर देंहटाएं
  5. वैरी ने हुँकार भरी जब,
    धनवा ने टंकार करी तब,
    नोक लेखनी की तब मेरी,
    भाला बन जाया करती है!
    रचना बन जाया करती है!!

    बहुत अच्छी अभिव्यक्ति।

    नीचे के बंदों में एक पंक्ति की कमी खलती है। शायद टाइप में छूट गया प्रतीत होता है।

    दीन-दुखी की व्यथा देखकर,
    धनवानों की कथा देखकर,
    कलम मचल जाया करती है!
    रचना बन जाया करती है!!


    भँवरे ने जब राग सुनाया,
    कोयल ने जब गाना गाया ,
    नींद टूट जाया करती है!
    रचना बन जाया करती है!!


    वैरी ने हुँकार भरी जब,
    धनवा ने टंकार करी तब,
    नोक लेखनी की तब मेरी,
    भाला बन जाया करती है!
    रचना बन जाया करती है!!

    उत्तर देंहटाएं
  6. शोला बनकर आग उगलते,
    कहाँ-कहाँ से शब्द निकलते,
    अक्षर-अक्षर मिल करके ही,
    माला बन जाया करती है!
    रचना बन जाया करती है!!

    बिलकुल सटीक......


    वैरी ने हुँकार भरी जब,
    धनवा ने टंकार करी तब,
    नोक लेखनी की तब मेरी,
    भाला बन जाया करती है!
    रचना बन जाया करती है!!

    कलम का भाला बनना बहुत उत्तम विचार....बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  7. दीन-दुखी की व्यथा देखकर,
    धनवानों की कथा देखकर,
    कलम मचल जाया करती है!
    रचना बन जाया करती है!!
    वाकई रचना तो ऐसे ही बनती है

    उत्तर देंहटाएं
  8. दीन-दुखी की व्यथा देखकर,
    धनवानों की कथा देखकर,
    दर्पण दिखलाने को मेरी,
    कलम मचल जाया करती है!
    रचना बन जाया करती है!!


    bilkul sahi baat kah di...........atyant sundar bhaav prekshan.

    उत्तर देंहटाएं
  9. आज तो आपने राज जाहिर कर दिया कि कैसे आप इतनी बढ़िया रचनायें लिख लेते हैं...

    उत्तर देंहटाएं
  10. आदरणीय मनोज कुमार जी!
    ध्यान दिलाने का शुक्रिया!
    --
    टाइप करते हुए जल्दबाजी में निम्नांकित छन्दों में एक-एक लाइन छूट गई थी!
    --
    अब जोड़ दी गईं हैं-
    --
    दीन-दुखी की व्यथा देखकर,
    धनवानों की कथा देखकर,
    दर्पण दिखलाने को मेरी,
    कलम मचल जाया करती है!
    रचना बन जाया करती है!!


    भँवरे ने जब राग सुनाया,
    कोयल ने जब गाना गाया,
    मधुर स्वरों को सुनकर मेरी,
    नींद टूट जाया करती है!
    रचना बन जाया करती है!!

    उत्तर देंहटाएं
  11. वैरी ने हुँकार भरी जब,
    धनवा ने टंकार करी तब,
    नोक लेखनी की तब मेरी,
    भाला बन जाया करती है!
    रचना बन जाया करती है!!

    ye to bahut hi gazab likh diya aapne..bahut hi zabardast hai..
    aabhaar..

    उत्तर देंहटाएं
  12. दर्पण दिखलाने को मेरी,
    कलम मचल जाया करती है!

    Jitni bhi tareef ki jaye, kam hogi.

    Congratulations for this wonderful creation.

    aapki 'kalam' ke aage nat mastak hun.

    Divya

    उत्तर देंहटाएं
  13. बहुत सुन्दर और शानदार रचना लिखा है आपने! आपकी लेखनी को सलाम!

    उत्तर देंहटाएं
  14. एक रचनाकार को हर गुजरने वाले पल, एक नयी अनुभूति दे देते हैं, और अनायास ही रचना बन जाया करती है...

    उत्तर देंहटाएं

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