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शुक्रवार, 21 मई 2010

“कर देंगे गुलशन वीराना” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

किया बहुत था प्यार हमेशा 
हमने सौतेलों को,
किन्तु उन्होंने 
हमको भाई नहीं माना!
--
लाड़-चाव से हाथ थाम कर 
चलना  जिन्हें सिखाया था,
जीवन में आगे बढ़ने का  
पथ जिनको दिखलाया था,
हमने उन्हें अनुज माना था,
किन्तु उन्होंने  अपना 
कभी नही जाना!
--
रची साजिशें गन्दी-गन्दी,
हमने सब कुछ सहन किया,
छोटा भाई समझकर हमने,
अब तक सब कुछ वहन किया,
किन्तु हमारे बल को अब तक,
नही उन्होंने पहचाना!
--
वो धमकी पर धमकी देते
हमने नही उन्हें धमकाया,
किन्तु उन्होंने उदारता का,
नाजाइज है लाभ उठाया,
अन्तिम चेतावनी हमारी,
कर देंगे गुलशन वीराना!

10 टिप्‍पणियां:

  1. हमारी अच्छाइयों को ,इंसानियत को जब कोई हमारी कमजोरी समझ लेता है ,तब इसी तरह पीड़ा होती है . कहती हूँ 'ना छेड़ बार बार कि वो भी नही हूँ मैं , जो तू समझने की भूल कर बैठा है '
    हा हा हा
    एकदम मेरे जैसे ही खयालात किन्तु
    कुछ तो अंतर रहना ही चाहिए 'उनमे ' और 'हम में '
    आपकी कविता अच्छी लगी,आपके व्यक्तित्व को दर्शाती है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. आप सौतेलों की बात करते हैं ...
    लोग तो सगों से जख्म खाते हैं ...!!

    @ indu puri jee ,
    कहती हूँ 'ना छेड़ बार बार कि वो भी नही हूँ मैं , जो तू समझने की भूल कर बैठा है '..
    waah ...!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. "किया बहुत था प्यार हमेशा
    हमने सौतेलों को,
    किन्तु उन्होंने
    हमको भाई नहीं माना! "

    आज के जीवन की कडवी सच्चाई दर्शाती रचना !!

    उत्तर देंहटाएं
  4. मै भी इंदु पुरी जी की टिफ्ण्णी से सहमत हुं.
    धन्यवाद इस सुंदर कविता के लिये

    उत्तर देंहटाएं
  5. aaj to apne bhi nahi pehchaante sautelon se kya umeed ki jaaye...

    उत्तर देंहटाएं
  6. प्रशंसनीय रचना - बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  7. वो शायद ये नहीं समझते की जो उनको बना सकते हैं एक दिन मिटा भी सकते हैं....

    हम लोग हैं जो हर बार गलतियाँ माफ करते जा रहे हैं...पर कब तक? बहुत सार्थक लेखन

    उत्तर देंहटाएं

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