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शुक्रवार, 21 मई 2010

“परछाँई की तासीर बदल जाती है” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

आमन्त्रण में बल हो तो ,
तस्वीर बदल जाती है।
पत्थर भी भगवान बनें,
तकदीर बदल जाती है।।

अपने अधरों को सीं कर,
इक मौन निमन्त्रण दे दो,
नयनों की भाषा से ही-
मुझको आमन्त्रण दे दो,
भँवरे की बिन गुंजन ही-
तदवीर बदल जाती है।
आमन्त्रण में बल हो तो ,
तस्वीर बदल जाती है।।

सरसों फूली, टेसू फूले,
फूल रहा है, सरस सुमन,
होली के रंग में भीगेंगे,
आशाओं के तन और मन,
आलिंगन के सागर में-
ताबीर बदल जाती है।
आमन्त्रण में बल हो तो,
तस्वीर बदल जाती है।।

पगचिन्हों का ले अवलम्बन,
आगे बढ़ता जाता हूँ ,
मन के दर्पण में राही की,
सूरत पढता जाता हूँ,
पल-पल में परछांई की,
तासीर बदल जाती है।
आमन्त्रण में बल हो तो,
तस्वीर बदल जाती है।।

20 टिप्‍पणियां:

  1. आपका और आपकी रचनाओं का जबाव नहीं..

    उत्तर देंहटाएं
  2. waah sir bahut hi sundar...ekdam sach kaha..tasveer badal jaati hai...

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना, बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. रोचक व दिलचस्प ...हार्दिक बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  5. आमन्त्रण में बल हो तो,
    तस्वीर बदल जाती है।।
    वाकई आमंत्रण में बल हो तो क्या नहीं हो सकता है
    बहुत सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  6. अपने अधरों को सीं कर,
    इक मौन निमन्त्रण दे दो,
    नयनों की भाषा से ही-
    मुझको आमन्त्रण दे दो,
    भँवरे की बिन गुंजन ही-
    तदवीर बदल जाती है।
    आमन्त्रण में बल हो तो ,
    तस्वीर बदल जाती है।।

    bahut hi sundar aur bhabhini rachna.

    उत्तर देंहटाएं
  7. बेहतरीन प्रस्तुति.......मौन निमंत्रण और नयनों की भाषा......खूबसूरत बिम्ब.....श्रेष्ठ सृजन अनवरत रखे.........शुभकामनाएं।

    उत्तर देंहटाएं
  8. अपने अधरों को सीं कर,
    इक मौन निमन्त्रण दे दो,
    नयनों की भाषा से ही-
    मुझको आमन्त्रण दे दो,
    भँवरे की बिन गुंजन ही-
    तदवीर बदल जाती है।
    आमन्त्रण में बल हो तो ,
    तस्वीर बदल जाती है।।
    बेहतरीन प्रस्‍तुति !

    उत्तर देंहटाएं
  9. मैंने यह गीत गाकर देखा!
    --
    आनंद आ गया,
    क्योंकि इसकी लय बहुत सुंदर बन रही है!
    --
    गरमी के मौसम में होली के रंगों की
    सुखद याद दिलाकर इसने मन को सरसा दिया!

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना, बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत ही सुन्दर और दिलचस्प रचना लिखा है आपने! बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  12. अपने अधरों को सीं कर,
    इक मौन निमन्त्रण दे दो,
    नयनों की भाषा से ही-
    मुझको आमन्त्रण दे दो,
    वाह! क्या बात है!!!
    बहुत सुंदर रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  13. उम्दा रचना के लिए बधाइयाँ शास्त्री जी !!

    उत्तर देंहटाएं
  14. अपने अधरों को सीं कर,
    इक मौन निमन्त्रण दे दो,
    नयनों की भाषा से ही-
    मुझको आमन्त्रण दे दो,..

    पूरी रचना बहुत सुन्दर ....एक एक पंक्ति में सौंदर्य समाया हुआ है...बहुत अच्छी लगी

    उत्तर देंहटाएं

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