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गुरुवार, 27 मई 2010

“रचनाएँ रचवाती हो!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

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रोज-रोज सपनों में आकर,
छवि अपनी दिखलाती हो!
शब्दों का भण्डार दिखाकर,
रचनाएँ रचवाती हो!!

कभी हँस पर, कभी मोर पर,
जीवन के हर एक मोड़ पर,
भटके राही का माता तुम,
पथ प्रशस्त कर जाती हो!
शब्दों का भण्डार दिखाकर,
रचनाएँ रचवाती हो!!

मैं हूँ मूढ़, निपट अज्ञानी,
नही जानता काव्य-कहानी,
प्रतिदिन मेरे लिए मातु तुम,
नव्य विषय को लाती हो!
शब्दों का भण्डार दिखाकर,
रचनाएँ रचवाती हो!!

नही जानता पूजन-वन्दन,
नही जानता हूँ आराधन,
वर्णों की माला में माता,
तुम मनके गुँथवाती हो!
शब्दों का भण्डार दिखाकर,
रचनाएँ रचवाती हो!!

14 टिप्‍पणियां:

  1. वाह! बहुत बढ़िया...ऐसे ही रचवाती रहें आप रचते रहें और हम बांचते रहें.

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  2. वाह सर जी.....हम तो केवल निमित्त मात्र है...मां की कृपा से ही शब्द,भाव बनते है......आप पर ये कृपा सदैव बनी रहे........शुभकामनाएं।

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह जी बहुत अच्छी ओर सुंदर लगी आज की आप की रचना

    उत्तर देंहटाएं
  4. हम जो भी लिखते है सब इन्हीं की देन है..बहुत सुंदर रचना..बधाई शास्त्री जी

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत अच्छी ओर सुंदर लगी आज की आप की रचना..........

    उत्तर देंहटाएं
  6. बस यूँ ही सरस्वती माँ की कृपा बानी रहे और हम सब को बेहतरीन रचनाएँ पढने को मिलती रहें....बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  7. वाकई में आप पर मां सरस्वती की कृपा है..

    उत्तर देंहटाएं
  8. हमेशा की तरह बहुत सुन्दर रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  9. वाकई ! सुन्दर रचना इसे ही कहनी चाहिए
    आप पर माँ की कृपा है ,,,,और हमेशा रहेगी ,,,

    उत्तर देंहटाएं

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