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बुधवार, 19 मई 2010

“उम्र तमाम हो गई” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक)

पथ पर आगे बढ़ते-बढ़ते,
अब जीवन की शाम हो गई!
पोथी जग की पढ़ते-पढ़ते,
सारी उम्र तमाम हो गई!!


जितना आगे कदम बढ़ाया,
मंजिल ने उतना भटकाया, 
मन के मनके जपते-जपते, 
माला ही भगवान हो गई!
पोथी जग की पढ़ते-पढ़ते,
यों ही उम्र तमाम हो गई!!


चिढ़ा रही मुँह आज नव्यता,
सुबक-सुबक रो रही भव्यता,
गीत-गज़ल को रचते-रचते,
नैतिकता नीलाम हो गई!
पोथी जग की पढ़ते-पढ़ते,
यों ही उम्र तमाम हो गई!!


 स्वरलहरी अब मन्द हो गई,
नई नस्ल स्वच्छन्द हो गई,
घर की बातें रही न घर में,
दुनियाभर में  आम हो गई!
पोथी जग की पढ़ते-पढ़ते,
यों ही उम्र तमाम हो गई!!

23 टिप्‍पणियां:

  1. "स्वरलहरी अब मन्द हो गई,
    नूतन नस्ल स्वछन्द हो गई,
    घर की बातें रही न घर में,
    दुनियाभर में आम हो गई!
    पोथी जग की पढ़ते-पढ़ते,
    यों ही उम्र तमाम हो गई!!"

    जी सारा अनुभव ही निचौड़ दिया!

    कुंवर जी,

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर अभिव्यक्ति, अभिनन्दन !

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही भावुक और दर्शन से भरी कविता है , वैसे ही जैसे गीत नया गाता हूँ .

    http://madhavrai.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  4. पोथी जग की पढ़ते-पढ़ते,
    सारी उम्र तमाम हो गई!

    तजुर्बे हुए हैं....उम्र तमाम नहीं हुई

    स्वरलहरी अब मन्द हो गई,
    नूतन नस्ल स्वछन्द हो गई,
    घर की बातें रही न घर में,
    दुनियाभर में आम हो गई

    ये बात कोई अनुभवी ही लिख सकता है....

    उत्तम रचना ..

    उत्तर देंहटाएं
  5. शास्त्री जी आप इतना निराशावादी ना हों ,क्योकि आपके अनुभव और सुझाव की हमें जरूरत है / नैतिकता ही हम सबको और इस देश को बचा सकता है / बस जरूरत है एकजुट होने की / उम्दा प्रस्तुती /

    उत्तर देंहटाएं
  6. स्वरलहरी अब मन्द हो गई,
    नूतन नस्ल स्वछन्द हो गई,
    घर की बातें रही न घर में,
    दुनियाभर में आम हो गई!
    पोथी जग की पढ़ते-पढ़ते,
    यों ही उम्र तमाम हो गई!!
    शास्त्री जी लोग इतनी बात समझाने में बड़ी-बड़ी पोस्ट घिस देते हैं आपने चार लाइन में कह दिया।
    आपकी लेखनी को सलाम!!!!

    उत्तर देंहटाएं
  7. घर की बातें रही न घर में,
    दुनियाभर में आम हो गई!
    बहुत खूब

    उत्तर देंहटाएं
  8. हमें फक्र है कि कोशिशे हमारी नाकाम नहीं हुई
    जिन्दगी जी भर के जी है, उम्र तमाम नहीं हुई

    उत्तर देंहटाएं
  9. kavita to bahut acchi hai...lekin kahin man ki peeda ko bhi darsha rahi hai...shayad jeewan ka arth hi yahi hai...lekin taal-mel to rakhna hi hoga...
    bahut vichaarpoorn kavita hai...jeewan ke anubhavon ke karan hi likhi gayi hai...
    aapka aabhaar...

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत सुंदर रचना जी. धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  11. वाह वाह............बेहतरीन अभिव्यक्ति...............क्या बात कही है.....गज़ब कर दिया.

    उत्तर देंहटाएं
  12. शास्त्री जी बहुत खूब सुंदर विचारों से सजी एक बेहतरीन कविता ..लयबद्धता के साथ पढ़ने का मज़ा ही कुछ और है..लाज़वाब कविता..बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  13. शास्त्री जी अब हम आ गए हैं हम मिलकर सब गद्दारों का नाश करेंगे
    क्या करोगे हमारा मार्गदर्शन जी

    उत्तर देंहटाएं
  14. "स्वरलहरी अब मन्द हो गई,
    नई नस्ल स्वच्छन्द हो गई,
    घर की बातें रही न घर में,
    दुनियाभर में आम हो गई!
    पोथी जग की पढ़ते-पढ़ते,
    यों ही उम्र तमाम हो गई!!"


    ज़बरदस्त कविता, बहुत खूब! आपकी लेखनी से प्रतीत होता है की आप ज़मीन से जुड़े हुए रचनाकार हैं. आपकी रचनाएँ पढ़कर दिल को बहुत ख़ुशी मिली.

    उत्तर देंहटाएं
  15. बहुत भावना पूर्ण .. जीवन दर्शन से भरी रचना है ....

    उत्तर देंहटाएं

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