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शनिवार, 10 मार्च 2012

"हमें लिखना नही आया, उन्हें पढ़ना नही आया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों!
आज एक पुरानी रचना
प्रस्तुत कर रहा हूँ! 
बहारें ही बहारें थी,
बड़े दिलकश नजारे थे।
चहकती थीं हसीं कलियाँ,
महकते फूल प्यारे थे।
हमें हँसना नहीं आया।
उन्हें रोना नहीं आया।।

मिलन के गीत मन ही मन,
हमेशा गुन-गुनाता था।
हृदय का शब्द होठों पर,
कभी बिल्कुल न आता था।
हमें कहना नही आया।
उन्हें सुनना नही भाया।।

कभी जो भूलना चाहा,
जुबां पर उनकी ही रट थी।
अन्धेरी राह में उनकी,
चहल कदमी की आहट थी।
हमें सपना नही आया।
उन्हें अपना नही भाया।।

बहुत से पत्र लाया था,
मगर मजमून कोरे थे।
शमा के भाग्य में आये,
फकत झोंकें-झकोरे थे।
हमें लिखना नही आया।
उन्हें पढ़ना नही आया।।

बने हैं प्रीत के क्रेता,
जमाने भर के सौदागर।
मुहब्बत है नही सौदा,
सितम कैसे करूँ उन पर।
हमें लेना नही आया।
उन्हे देना नही भाया।।

22 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत प्यारी रचना....

    हमें कहना नही आया।
    उन्हें सुनना नही भाया।।

    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बने हैं प्रीत के क्रेता,
    जमाने भर के सौदागर।
    मुहब्बत है नही सौदा,
    सितम कैसे करूँ उन पर।
    हमें लेना नही आया।
    उन्हे देना नही भाया।………………वाह बहुत खूबसूरत भाव समन्वय

    उत्तर देंहटाएं
  3. जबरदस्त पुरानी रचना ।

    गुरु जी !!

    भाव और बहाव अनोखे हैं ।

    पुरानी भी पोस्ट करते रहें।




    फूल हँसे कलियाँ मुस्काई, कविवर हँसना न आया ।

    शब्द हृदय के गीत मिलन के, होंठ पे बसना न आया ।

    कोरे कागज़ काले अक्षर, लिखना पढना न आया ।

    लेना देना सीख सका न, तुम बिन बढ़ना न आया ।।



    दिनेश की टिप्पणी : आपका लिंक

    dineshkidillagi.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  4. गुजरी यादों को अच्छा सजाया आपने !
    मुबारक हो !

    उत्तर देंहटाएं
  5. बने हैं प्रीत के क्रेता,
    जमाने भर के सौदागर।
    मुहब्बत है नही सौदा,
    सितम कैसे करूँ उन पर।

    सुंदर प्रस्तुति,..........

    उत्तर देंहटाएं
  6. बने हैं प्रीत के क्रेता,
    जमाने भर के सौदागर।
    मुहब्बत है नही सौदा,
    सितम कैसे करूँ उन पर।
    हमें लेना नही आया।
    उन्हे देना नही भाया।।
    औरों से कहा तुमने ,औरों को सूना तुमने ,
    कुछ हमसे कहा होता ,कुछ हमसे सूना होता .
    एक एहसास को जगाती नसीब के ...

    उत्तर देंहटाएं
  7. एक एहसास को जगाती नसीब के ...

    उत्तर देंहटाएं
  8. इस कविता में कुछ ऐसा है जिसकी टीस दिल में समा गई है .. तभी तो उन्हें सुनना नहीं आया हमें कहना नहीं आया।

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत अच्छी पंक्तियाँ "हमें लेना नहीं आया ,उन्हें देना नहीं आया "
    उंदा प्रस्तुति |
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  10. हमें लेना नही आया।
    उन्हे देना नही भाया।।

    वेदना मन की ,व्यथा मन की ...
    बहुत सुंदरता से प्रकट की है ...
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  11. हमें लेना नही आया।
    उन्हे देना नही भाया।।बहुत अच्छी पंक्तियाँ

    उत्तर देंहटाएं
  12. वाह वाह... बहुत प्यारी रचना सर...
    सादर बधाई..

    उत्तर देंहटाएं
  13. बहुत से पत्र लाया था,
    मगर मजमून कोरे थे।
    शमा के भाग्य में आये,
    फकत झोंकें-झकोरे थे।
    हमें लिखना नही आया।
    उन्हें पढ़ना नही आया।।
    सुन्दर रचना . सिर्फ आदमी होना मयस्सर नहीं है आदमी के लिए .चर्चा का एक एक मोती चुगा है .बहुत खूब चर्चा और उसका संयोजन और प्रस्तुति है जैसे सब कुछ आत्म सात किया हो .

    उत्तर देंहटाएं
  14. आपकी पोस्ट आज की ब्लोगर्स वीकली मीट (३४) मैं शामिल की गई है /आप आइये और अपने विचारों से हमें अवगत करिए /आप इसी तरह म्हणत और लगन से हिंदी की सेवा करते रहें यही कामना है /आभार /लिंक है
    http://hbfint.blogspot.in/2012/03/34-brain-food.html

    उत्तर देंहटाएं
  15. काश मन से मन का यह अन्तर मिट पाता, बहुत सुन्दर रचना..

    उत्तर देंहटाएं

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