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मंगलवार, 27 मार्च 2012

"धरती में सोना उपजाओ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


धरती का चेहरा निखरा है।
खेतों में सोना बिखरा है।।
बालरूप इसका था न्यारा।
हरा रंग लगता था प्यारा।।
जब यौवन का हुआ समापन।
रंग हुआ कितना मनभावन।।
उमड़ी हैं आशाएँ मन में।
खुशियाँ छाई हैं जन-जन में।
अब दाने घर में आयेंगे।
पूरे वर्ष इन्हें खायेंगे।।

धरती में सोना उपजाओ।
झूम-झूमकर नाचो गाओ।।

27 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर रचना ..और आपकी फोटो भी सोने पर सुहागा .. :)

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  2. बंडी पहने कृषक निराला
    फसल देख होता मतवाला
    भूखा रह जाता खुद लेकिन
    देता दुनियाभर को निवाला.

    सुंदर सादगीपूर्ण रचना........

    उत्तर देंहटाएं
  3. धरती उपजे सोना .....

    बहुत सुन्दर.
    सादर.
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुन्दर चित्रों के साथ सुन्दर भाव....

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर और उपयुक्त सन्देश!...

    उत्तर देंहटाएं
  6. किसान की दशा सुधरने लगे तो आनंद आ जाए. सुन्दर रचना सुन्दर चित्र.

    उत्तर देंहटाएं
  7. बीज से लेकर बाली पकने तक की जीवन गाथा रचना के माध्यम से उतार दी ... बधाई शास्त्री जी ...

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुन्दर चित्रमयी प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  9. bahut sundar dono avasthaon ke gehun ke chitra
    aur sundar kavita.

    उत्तर देंहटाएं
  10. atisundar post ,man ko prakrti or dhra se naye rishton men bandhati .svagat hae meri nai post par saadar.

    उत्तर देंहटाएं
  11. वाह! कृषि-प्रधान देश की अमूल्य धरोहर पर शानदार रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  12. अरवीला रविकर धरे, चर्चक रूप अनूप |
    प्यार और दुत्कार से, निखरे नया स्वरूप ||

    आपकी टिप्पणियों का स्वागत है ||

    बुधवारीय चर्चा-मंच

    charchamanch.blogspot.com

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  13. बहुत खूब लिखा है, बेहतरीन प्रस्तुति!

    उत्तर देंहटाएं
  14. सुन्दर चित्रों से सजी बढ़िया रचना |
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  15. बेहतरीन सृजन , अपने सन्देश में सफल .....बधाईयाँ जी

    उत्तर देंहटाएं
  16. लहलहाते खेत ही धरती का सोना हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  17. lahlahate kheton ki baat hi nirali hai..
    bahut sundar chitramay prastuti..aabhar

    उत्तर देंहटाएं
  18. बहुत सुंदर चित्रमय कविता....आभार

    उत्तर देंहटाएं

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