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शनिवार, 17 मार्च 2012

"खिसक गया जीवन आधार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


महँगी रोटी-सस्ती कार।
खिसक गया जीवन आधार।।

भीख माँग कर द्वारे-द्वारे,
जा बैठे ऊँचे आसन पर।
भोली जनता को भरमाया,
इठलाते सत्ता-शासन पर।
बापू की केंचुली पहनकर,
पाकर वोट कर दिया वार।
खिसक गया जीवन आधार।।

बना दिया कुछ मक्कारों ने
घोटालों वाला यह देश।
उज्जवल लोकतन्त्र के तन पर
लिख डाला काला सन्देश।
चना-चबेना तक मँहगा है,
निर्धन पर भारी सरकार।
खिसक गया जीवन आधार।।

धूप और बारिश-सर्दी में,
कृषक अन्न को उपजाते हैं।
श्रमिक बहा कर खून-पसीना,
रैन-दिवस खटते जाते हैं।
मौज उड़ाते इनके बल पर,
अधिकारी, बाबू-मक्कार।
खिसक गया जीवन आधार।।

19 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया सार्थक रचना....

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह!!!
    सार्थक रचना...

    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  3. खिसक गया जीवन आधार।।
    बिल्‍कुल सटीक बात कही है आपने ...उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. इसके आगे अब "जीवन" ही खिसकेगा ...?
    शुभकामनाएँ!

    उत्तर देंहटाएं
  5. उज्जवल लोकतन्त्र के तन पर
    लिख डाला काला सन्देश।----यही तो हो रहा है
    खूबसूरत रचना

    उत्तर देंहटाएं
  6. बना दिया कुछ मक्कारों ने
    घोटालों वाला यह देश।
    उज्जवल लोकतन्त्र के तन पर
    लिख डाला काला सन्देश।
    बहुत सुंदर भाव अभिव्यक्ति,बेहतरीन सटीक रचना,......

    MY RESENT POST... फुहार....: रिश्वत लिए वगैर....

    उत्तर देंहटाएं
  7. खिसका कहाँ खतम ही हो गया .

    उत्तर देंहटाएं
  8. बना दिया कुछ मक्कारों ने
    घोटालों वाला यह देश।
    उज्जवल लोकतन्त्र के तन पर
    लिख डाला काला सन्देश।
    चना-चबेना तक मँहगा है,
    निर्धन पर भारी सरकार।
    खिसक गया जीवन आधार।।
    बिल्कुल सटीक और सार्थक प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  9. खिसक गया जीवन आधार
    किस विध माने तीज तिहार
    बहुत ही सटीक कविता.

    उत्तर देंहटाएं
  10. आप किसी विषय को इतने सरल ढंग से काव्य का रूप दे देते हैं कि ईर्ष्या होती है कि मैं ऐसा क्यों नहीं लिख पाता?
    बहुत बढिया।

    उत्तर देंहटाएं
  11. चारों ओर से घेरती विषम स्थितियों का प्रभावशाली चित्रण -जो सहज ही मन में उतर जाता है !

    उत्तर देंहटाएं
  12. सार्थक और सामयिक पोस्ट, आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  13. धूप और बारिश-सर्दी में,
    कृषक अन्न को उपजाते हैं।
    श्रमिक बहा कर खून-पसीना,
    रैन-दिवस खटते जाते हैं।
    मौज उड़ाते इनके बल पर,
    अधिकारी, बाबू-मक्कार।

    खिसक गया जीवन आधार।।

    बेहतरीन रचना 'ढोल की पोल 'खोलती .

    उत्तर देंहटाएं
  14. हम कितना भी चीखे चिल्लाये , महंगाई ये अपनी सुविधा से ही बढ़ाएंगे !

    उत्तर देंहटाएं

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