‘‘दोहे-खिलते हुए पलाश’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
उच्चारण सुधरा नहीं, बना नहीं परिवेश। अँग्रेजी के जाल में, जकड़ा सारा देश।१। भूल गये है मनचले, हिन्दुस्तानी भेष। भौँडे कपड़े धार के, किया कलंकित देश।२। लाँघ रहे सीमाओं को, नंगा कर सिंगार। मोबाइल से सुन रहे, गोरों की झंकार।३। फागुन के परिवेश में, होली का आनन्द। फाग-फुहारों से सजे, गीत हो गये मन्द।४। खुला निमन्त्रण दे रहे, खिलते हुए पलाश। पूरब की ले सभ्यता, और न करो विनाश।५। अम्बुआ, जामुन-नीम भी, देते हैं ये सीख। परदेशों के सामने, माँग रहे क्यों भीख।६। |


18 comments:
खुला निमन्त्रण दे रहे, खिलते हुए पलाश।
अपनाकर निज सभ्यता, अब मत करो विनाश।५।
sunder abhivyakti ....
vaah shastri ji kamaal ke maanav sudhaarak dohe prastut kiye hain maja aa gaya.
kamal ki baat kahee hai aapne guru jee!
सुंदर दोहे....
न अंग्रेज, न भारतीय, बस वर्णसंकर होकर रह गये हैं।
खुला निमन्त्रण दे रहे, खिलते हुए पलाश।
पूरब की ले सभ्यता, और न करो विनाश।५।
अम्बुआ, जामुन-नीम भी, देते हैं ये सीख।
परदेशों के सामने, माँग रहे क्यों भीख।६
वाह..!
अम्बुआ, जामुन-नीम भी, देते हैं ये सीख।
परदेशों के सामने, माँग रहे क्यों भीख''''
वाह....बहुत खूब सुंदर रचना.....
खुला निमन्त्रण दे रहे, खिलते हुए पलाश।
पूरब की ले सभ्यता, और न करो विनाश।५।
अम्बुआ, जामुन-नीम भी, देते हैं ये सीख।
परदेशों के सामने, माँग रहे क्यों भीख।६।
्क्या खूब कहा है…………शानदार
होली के रंग ऐसे भी गिरने चाहिये
सामने वालों के चेहरे पीले पडने चाहिये
सुंदर दोहे.सुंदर रचना.....
सार्थक दोहे ...
फुहार और फटकार एक साथ!!!
:-)
सादर.
खुला निमन्त्रण दे रहे, खिलते हुए पलाश।पूरब की ले सभ्यता, और न करो विनाश।५।
बढ़िया संदेशपूर्ण रचना !
मलें कालिख
कहते कर्णधार
चिंतित देश
"अम्बुआ, जामुन-नीम भी, देते हैं ये सीख
परदेशों के सामने, माँग रहे क्यों भीख"
अति सुन्दर,मनभावन व प्रेरणा दायक दोहे.... होली की शुभ कामनाएं.
बहुत ही अच्छा लिखा है.....
शुक्रवारीय चर्चा मंच पर आपका स्वागत
कर रही है आपकी रचना ||
charchamanch.blogspot.com
बहुत सुन्दर दोहे.
उच्चारण सुधरा नहीं, बना नहीं परिवेश।
अँग्रेजी के जाल में, जकड़ा सारा देश।१।
कितने शहरी हो गए लोगों के ज़ज्बात ,
हिंदी भी करने लगी अंग्रेजी में बात .
अव्वल रचना है शाष्त्री जी की .
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