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शनिवार, 31 मार्च 2012

"प्यार करने का जमाना आ गया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


हसरतें छूने लगी आकाश को,
पत्थरों को गीत गाना आ गया है।

लक्ष्य था मुश्किल, पहुँच से दूर था,
साधना हमको निशाना आ गया है।

मन-सुमन वीरान उपवन थे पड़े,
पंछियों को चहचहाना आ गया है।

हाथ लेकर हाथ में जब चल पड़े,
साथ उनको भी निभाना आ गया है।

ज़िन्दग़ी के जख़्म सारे भर गये,
प्यार करने का जमाना आ गया है।

जब चटककर रूप कलियों ने निखारा,
साज गुलशन को बजाना आ गया है।

25 टिप्‍पणियां:

  1. ज़िन्दग़ी के जख़्म सारे भर गये,
    प्यार करने का जमाना आ गया है।
    .......इस उत्कृष्ट रचना के लिए ... बधाई स्वीकारें.

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह वाह वाह वाह..भारतीय नागरिक-indzen.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह क्या कहने शास्त्री जी। :)
    मन-सुमन वीरान उपवन थे पड़े,
    पंछियों को चहचहाना आ गया है। क्या खूब।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बढ़िया विषय ।
    बधाई आपको ।।

    उत्तर देंहटाएं
  5. जब चटककर “रूप” कलियों ने निखारा,
    साज गुलशन को बजाना आ गया है।

    वाह ..शास्त्री जी ...बहुत सुंदर शब्दों का प्रयोग ...सुंदर भाव ...सुंदर रचना ..!!

    उत्तर देंहटाएं
  6. गुरु जी

    रविकर ही है इधर

    टिप्पणी को

    अनर्गल की कोटि में न रख देना ।



    पत्थरों पर का भरोसा, परका रहा यह दिल ।
    धकधकाधक है धड़कता, लक्ष्य था मुश्किल ।

    पक्षियों को डर लगे ना, आज पत्थर तीर से
    जिंदगी में हो रहे जो, आप अब शामिल ।।

    उत्तर देंहटाएं
  7. वाह ...बहुत खूब ...बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुन्दर शास्त्री जी....
    हाथ लेकर हाथ में जब चल पड़े,
    साथ उनको भी निभाना आ गया है।

    अति सुन्दर
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  9. ज़िन्दग़ी के जख़्म सारे भर गये,प्यार करने का जमाना आ गया है!
    बहुत ही सुन्दर रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  10. देख मैं भी रहा था उसी जमाने को कभी से
    चलिये आप ने बताया वो वहाँ आ गया है।
    बधाई!!!

    उत्तर देंहटाएं
  11. ज़िन्दग़ी के जख़्म सारे भर गये,
    प्यार करने का जमाना आ गया है।

    बहुत सुंदर प्रस्तुति .....

    उत्तर देंहटाएं
  12. हसरतें छूने लगी आकाश को,
    पत्थरों को गीत गाना आ गया है।

    लक्ष्य था मुश्किल, पहुँच से दूर था,
    साधना हमको निशाना आ गया है।

    बहुत सुन्दर रचना शेयर करने के लिये बहुत बहुत आभार,

    उत्तर देंहटाएं
  13. ज़िन्दग़ी के जख़्म सारे भर गये,
    प्यार करने का जमाना आ गया है।....बहुत सुन्दर...

    उत्तर देंहटाएं
  14. हम तो सोचते रहे कि प्यार से ही ज़ख्म भरते हैं। पर आप कह रहे हैं कि ज़ख्म भर गए,चलो इसलिए प्यार किया जाए!

    उत्तर देंहटाएं
  15. बहुत ही खूबसूरत रचना !
    शास्त्री जी ,बधाई स्वीकारें !

    उत्तर देंहटाएं
  16. हाथ लेकर हाथ में जब चल पड़े,
    साथ उनको भी निभाना आ गया है।

    ज़िन्दग़ी के जख़्म सारे भर गये,
    प्यार करने का जमाना आ गया है।
    बहुत ही उत्तम भाव हैं इस कविता के।

    उत्तर देंहटाएं
  17. हसरतें छूने लगी आकाश को,
    पत्थरों को गीत गाना आ गया है।

    लक्ष्य था मुश्किल, पहुँच से दूर था,
    साधना हमको निशाना आ गया है।
    हसरतें छूने लगी आकाश को,
    पत्थरों को गीत गाना आ गया है।

    लक्ष्य था मुश्किल, पहुँच से दूर था,
    साधना हमको निशाना आ गया है।
    गीत या ग़ज़ल जो भी है यह सांगीतिक है .भाव और अर्थ -छटा से लबालब है .बड़ा रोमांटिक गीत -नुमा ग़ज़ल मिक्स है यह .

    लो वही आशिक पुराना आ गया ,

    फिर हमें हंसना हंसाना आगया ,

    गीत फिर से गुनगुनाना आगया है ,

    मस्त सावन का महीना आगया है .

    उत्तर देंहटाएं
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    उत्तर देंहटाएं
  19. आज 01/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर (सुनीता शानू जी की प्रस्तुति में) लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  20. बहुत ही सुन्दर..
    प्यारभरी रचना:-)

    उत्तर देंहटाएं
  21. लक्ष्य था मुश्किल, पहुँच से दूर था,
    साधना हमको निशाना आ गया है....
    बहुत ही खूबसूरत रचना

    उत्तर देंहटाएं

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