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मंगलवार, 20 मार्च 2012

"गरल भरा हमने गागर में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


अमृत रास न आया हमको,
गरल भरा हमने गागर में।
कैसे प्यास बुझेगी मन की,
खारा जल पाया सागर में।।

कथा-कीर्तन और जागरण,
रास न आये मेरे मन को।
आपाधापी की झंझा में,
होम कर दिया इस जीवन को।
वन का पंछी डोल रहा है,
भिक्षा पाने को घर-घर में।
कैसे प्यास बुझेगी मन की,
खारा जल पाया सागर में।।

आज धरा-रानी के हमने,
लूट लिए सारे आभूषण।
नंगे पर्वत, सूखे झरने,
अट्टहास करता है दूषण।
नहीं जवानी और रवानी,
कायरता है नर-नाहर में।
कैसे प्यास बुझेगी मन की,
खारा जल पाया सागर में।।

खनन बढ़ा है, खनिज घटे हैं,
नकली मिलते आज रसायन।
हारे का हथियार बचा है,
गीता-रामायण का गायन।
कैसे ओढ़ूँ और बिछाऊँ,
सिमटा हूँ छोटी चादर में।
कैसे प्यास बुझेगी मन की,
खारा जल पाया सागर में।।

27 टिप्‍पणियां:

  1. स्थितियों परिस्थितियों को उकेरती सुन्दर रचना!
    सादर!

    उत्तर देंहटाएं
  2. रची उत्कृष्ट |

    चर्चा मंच की दृष्ट --

    पलटो पृष्ट ||


    बुधवारीय चर्चामंच

    charchamanch.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  3. कैसे ओढ़ूँ और बिछाऊँ,
    सिमटा हूँ छोटी चादर में।

    उत्तर देंहटाएं
  4. पर्यावरण संकट को काव्य में बखूबी ढाला आपने...
    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  5. आज धरा-रानी के हमने,
    लूट लिए सारे आभूषण।
    नंगे पर्वत, सूखे झरने,
    अट्टहास करता है दूषण।
    नहीं जवानी और रवानी,
    कायरता है नर-नाहर में।
    कैसे प्यास बुझेगी मन की,
    खारा जल पाया सागर में।।

    सुंदर पोस्ट

    my resent post

    काव्यान्जलि ...: अभिनन्दन पत्र............ ५० वीं पोस्ट.

    उत्तर देंहटाएं
  6. खनन बढ़ा है, खनिज घटे हैं,
    नकली मिलते आज रसायन।
    हारे का हथियार बचा है,
    गीता-रामायण का गायन।...sndeshprat rachna..

    उत्तर देंहटाएं
  7. आज धरा-रानी के हमने,
    लूट लिए सारे आभूषण।
    नंगे पर्वत, सूखे झरने,
    अट्टहास करता है दूषण।
    नहीं जवानी और रवानी,
    कायरता है नर-नाहर में।
    कैसे प्यास बुझेगी मन की,
    खारा जल पाया सागर में।।

    खनन बढ़ा है, खनिज घटे हैं,
    नकली मिलते आज रसायन।
    हारे का हथियार बचा है,
    गीता-रामायण का गायन।
    कैसे ओढ़ूँ और बिछाऊँ,
    सिमटा हूँ छोटी चादर में।
    पर्यावरण सचेत पारि- तंत्रों का सहज मानवीकरण करती भावबोध संसिक्त रचना .बहुत खूब कहा है -



    'कैसे इस मन को बहलाऊ गिरजे .-मस्जिद मंदिर जाकर '

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुंदर और सशक्त प्रस्तुति....

    उत्तर देंहटाएं
  9. सही कहा अच्छी चीजों को छोड़ दिया है.

    उत्तर देंहटाएं
  10. बेहद उम्दा और शानदार प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  11. कैसे प्यास बुझेगी मन की,
    खारा जल पाया सागर में।।

    -बहुत सुन्दर गीत!!

    उत्तर देंहटाएं
  12. sarthak post hae prakrti par manav ki krurta ki prakashtha par dhyan aakarshit karaya hae sir aapne aabhar.

    उत्तर देंहटाएं
  13. वन का पंछी डोल रहा है,
    भिक्षा पाने को घर-घर में।
    कैसे प्यास बुझेगी मन की,
    खारा जल पाया सागर में।।
    इस कविता में जहां एक ओर पर्यावरण के प्रति चिंता जताई गई है वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक अनुभूति भी हो रही है।

    उत्तर देंहटाएं
  14. गरल मिला है,
    अभी मिलेगा अमृत,
    थोड़ा श्रम बाकी है।

    उत्तर देंहटाएं
  15. वाह! बहुत ही गहराई लिए हुए रचना है...

    उत्तर देंहटाएं
  16. वाह ...बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

    उत्तर देंहटाएं
  17. समसामयिक दुर्दशा पर तीखा प्रहार ! अतिसुन्दर सर जी !

    उत्तर देंहटाएं
  18. बहुत ही बढ़िया ,सुन्दर रचना...

    उत्तर देंहटाएं
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