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बुधवार, 16 मई 2012

"छँट जाएगा, दलाली का आवरण" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


मुद्रा का निरन्तर प्रकाशन,
बढ़ती हुई मँहगाई।
निर्घनों का स्वेद,
धनवानों की कमाई।
--
वादाखिलाफी है
टूटते हुए अनुबन्ध। 
स्वप्न का हकीकत से,
नहीं है सम्बन्घ।
--
फिर से चलने लगी है,
जनता की नब्ज़।
अब हो रहा है,
शासकों को कब्ज़।
--
अन्ना हजारे,
गांधी का अवतार।
हिल उठी है,
काले अंग्रेजों की सरकार।
--
जाग उठे हैं खुद्दार,
काँप उठी है सरकार।
आयेगा जनलोकपाल,
बच नहीं पायेंगे मक्कार।
--
बाँदल छटेंगे,
उदित होगा भास्कर।
घोटाले घटेंगे,
सुख देगा दिनकर।
--
जन-गण की आशाओं पर,
अब न होगा तुषारापात।
उपवन में होगी सुवास,
आयेगा नवल प्रभात।
--
चलता रहेगा,
जागरण।
छँट जाएगा,
दलाली का आवरण।

11 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया...सभी लघु कविताएँ सार्थक और सटीक हैं

    उत्तर देंहटाएं
  2. शोक काल की ग्रह-दशा, हो हलचल दरबार |
    भ्रष्ट आचरण ले बना, ड्राफ्ट लाभ अनुसार |
    ड्राफ्ट लाभ अनुसार, लोक न लोक-तंत्र में |
    तंत्र ऊर्जा-हीन, शक्ति न बची मन्त्र में |
    खाल खींचता पाल, बकरियाँ लोकपाल की |
    मने खैर कब तलक, खबर है शोक-काल की ||

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी अनुभूतियाँ अपनी सी ,अब तो महंगाई भी अपनी
    सी होने लगी है ......

    उत्तर देंहटाएं
  4. सटीक व सार्थक प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुंदर रचना,..अच्छी प्रस्तुति

    MY RECENT POST काव्यान्जलि ...: बेटी,,,,,

    उत्तर देंहटाएं
  6. क्या ही रचनाएं हैं सर...
    सादर.

    उत्तर देंहटाएं

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