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गुरुवार, 24 मई 2012

"भारत माँ के राजदुलारे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 लड़ते खुद की निर्धनता से,
भारत माँ के राजदुलारे।
बीन रहे हैं कूड़ा-कचरा,
बालक कितने प्यारे-प्यारे।।
 
भूख बन गई है मजबूरी,
बाल श्रमिक करते मजदूरी,
झूठे सब सरकारी दावे,
इनकी किस्मत कौन सँवारे।
बीन रहे हैं कूड़ा-कचरा,
बालक अपने प्यारे-प्यारे।।
 
टूटे-फूटे हैं कच्चे घर,
नहीं यहाँ पर, पंखे-कूलर.
महलों को मुँह चिढ़ा रही है,
इनकी झुग्गी सड़क किनारे।
बीन रहे हैं कूड़ा-कचरा,
बालक अपने प्यारे-प्यारे।।
 
मिलता इनको झिड़की-ताना,
दूषित पानी, झूठा खाना,
जनसेवक की सेवा में हैं,
अफसर-चाकर कितने सारे।
बीन रहे हैं कूड़ा-कचरा,
बालक अपने प्यारे-प्यारे।।

18 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत मार्मिक ह्रदय स्पर्शी चित्र और रचना

    उत्तर देंहटाएं
  2. देश की यथार्थ स्थिति को बयान करती रचना |

    उत्तर देंहटाएं
  3. देश के इन नौनिहालों कि सटीक तस्वीर खींच दी है ... बहुत संवेदनशील रचना

    उत्तर देंहटाएं
  4. सच्चाई को उजागर करती बेहद संवेदनशील रचना

    उत्तर देंहटाएं
  5. इस दृश्य को देख देश के भविष्य के प्रति सशंकित हो जाता हूँ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. मित्रों चर्चा मंच के, देखो पन्ने खोल |

    आओ धक्का मार के, महंगा है पेट्रोल ||

    --

    शुक्रवारीय चर्चा मंच

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत मार्मिक
    वस्तुस्थिति यही है

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुंदर मार्मिक अभिव्यक्ति,

    MY RECENT POST,,,,,काव्यान्जलि,,,,,सुनहरा कल,,,,,

    उत्तर देंहटाएं
  9. लड़ते खुद की निर्धनता से,
    भारत माँ के राजदुलारे।
    बीन रहे हैं कूड़ा-कचरा,
    बालक कितने प्यारे-प्यारे।।
    कितने हैं किस्मत के मारे ,बालक कितने प्यारे प्यारे ,लोकतंत्र के हैं रखवारे ,घर आँगन के ये उजियारे ,...बहुत अच्छी प्रस्तुति व्यवस्था की चिरौरी करती .बधाई स्वीकार करें . कृपया यहाँ भी पधारें -
    बेवफाई भी बनती है दिल के दौरों की वजह . http://kabirakhadabazarmein.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं

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