"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

शनिवार, 26 मई 2012

"हर बिल्ला नाखून छिपाता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


सच्चाई में बल होता है,
झूठ पकड़ में है आ जाता।
नाज़ुक शाखों पर जो चढ़ता,
वो जीवनभर है पछताता।

समझदार को मीत बनाओ,
नादानों को मुँह न लगाओ।
बैरी दानिशमन्द भला है,
राज़ न अपना उसे बताओ।
आसमान पर उड़नेवाला,
औंधे मुँह धरती पर आता।
नाज़ुक शाखों पर जो चढ़ता,
वो जीवनभर है पछताता।

उससे ही सम्बन्ध बढ़ाओ,
प्रीत-रीत को जो पहचाने।
गिले भुलाकर गले लगाओ,
धर्म मित्रता का जो जाने।
मन के सागर में पलता है,
वफा-जफा का रिश्ता-नाता।
नाज़ुक शाखों पर जो चढ़ता,
वो जीवनभर है पछताता।

शक्ल सलोनी, चाल घिनौनी,
मुख में राम, बगल में चाकू।
धर्म-गुरू का रूप बनाए,
लूट रहे जनता को डाकू।
मूषक का मन भरमाने को,
हर बिल्ला नाखून छिपाता।
नाज़ुक शाखों पर जो चढ़ता,
वो जीवनभर है पछताता।

17 टिप्‍पणियां:

  1. शक्ल सलोनी, चाल घिनौनी,
    मुख में राम, बगल में चाकू।
    धर्म-गुरू का रूप बनाए,
    लूट रहे जनता को डाकू।
    मूषक का मन भरमाने को,
    हर बिल्ला नाखून छिपाता।
    नाज़ुक शाखों पर जो चढ़ता,
    वो जीवनभर है पछताता।
    बहुत अच्छी सचेत करती हुई संदेशपरक रचना ये वाला पद्य तो बहुत ही उत्तम है

    उत्तर देंहटाएं
  2. मन के सागर में पलता है,
    वफा-जफा का रिश्ता-नाता।
    नाज़ुक शाखों पर जो चढ़ता,
    वो जीवनभर है पछताता।

    सार्थक सन्देश देती बढ़िया रचना !

    उत्तर देंहटाएं
  3. समझदार को मीत बनाओ..सही कहा शास्त्री जी..आभार..

    उत्तर देंहटाएं
  4. समझदार को मीत बनाओ,नादानों को मुँह न लगाओ।
    ...shiksha-prad sundar rachna...aabhaar!

    उत्तर देंहटाएं
  5. शक्ल सलोनी, चाल घिनौनी,
    मुख में राम, बगल में चाकू।
    धर्म-गुरू का रूप बनाए,
    लूट रहे जनता को डाकू।
    मूषक का मन भरमाने को,
    हर बिल्ला नाखून छिपाता।----------सटीक

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर प्रेरक बेहतरीन रचना,,,,,

    MY RECENT POST,,,,,काव्यान्जलि,,,,,सुनहरा कल,,,,,

    उत्तर देंहटाएं
  7. उपयोगी संदेश...बहुत सुंदर रचना !!!

    उत्तर देंहटाएं
  8. "मूषक का मन भरमाने को,
    हर बिल्ला नाखून छिपाता।"

    वाह !

    उत्तर देंहटाएं
  9. सच्ची खरी बात ! बहुत सही!
    सच्चाई में "बल" होता है, मगर बल नहीं होते..., झूठ में इतने बल पड़े होते हैं...कि वो निर्बल पड़ जाता है! सच्चाई की मज़बूत शाख थाम जो चला जीवन में...मुँह के बल कभी नहीं गिरता...

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails