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गुरुवार, 17 मई 2012

"देश में हम जहर उगलते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


इन सियासत के जंगलों में अब, लोग परचम नये बदलते हैं
छोड़ उजड़े हुए दयारों को, इक नयी अंजुमन में चलते हैं

कभी पत्तों के रँग में ढल जाते, कभी शाखों के रँग के हो जाते
हम तो गिरगिट की तरह से अपने, रंग पल में यहाँ बदलते हैं

कल जहाँ पर चखी मलाई थी, घूस सौदों में जम के खाई थी
किन्तु जब से बदल गई बोतल, नई बोतल में जाम ढलते हैं

हम मुसाफिर वही पुराने हैं, और मंजिल भी तो पुरानी है
जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाने को, नई राहों पे हम मचलते हैं

रूप बदला है जमाने के लिए, केंचुली से खादी की,
हम हैं विषधर वही पुराने से, देश में हम जहर उगलते हैं

19 टिप्‍पणियां:

  1. “रूप” बदला है जमाने के लिए, केंचुली की खादी से,
    हम हैं विषधर वही पुराने से, देश में हम जहर उगलते हैं,,

    बहुत सुंदर रचना,..अच्छी प्रस्तुति,,,,,,

    MY RECENT POSTफुहार....: बदनसीबी,.....

    उत्तर देंहटाएं
  2. “रूप” बदला है जमाने के लिए, केंचुली से खादी की,
    हम हैं विषधर वही पुराने से, देश में हम जहर उगलते हैं......वाह: बहुत सुन्दर और सटीक प्रस्तुति..

    उत्तर देंहटाएं
  3. बिलकुल सही कहा इन गिरगिटों के लिए आज के दौर में ये ही हो रहा है सार्थक रचना

    उत्तर देंहटाएं
  4. Sach farmaya.

    Please see

    http://mushayera.blogspot.com/2012/05/blog-post.html

    उत्तर देंहटाएं
  5. कभी पत्तों के रँग में ढल जाते, कभी शाखों के रँग के हो जाते
    हम तो गिरगिट की तरह से अपने, रंग पल में यहाँ बदलते हैं…………सत्य वचन

    उत्तर देंहटाएं
  6. आमंत्रित सादर करे, मित्रों चर्चा मंच |

    करे निवेदन आपसे, समय दीजिये रंच ||

    --

    शुक्रवारीय चर्चा मंच |

    उत्तर देंहटाएं
  7. नेताओ की रंग बदलती नेताई
    बहुत बेहतरीन है.....
    सुन्दर रचना:-)

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाह बहुत खूब ....राजनीति रंग लिए हुए लोग अपने आस पास भी मिल जायंगे

    उत्तर देंहटाएं
  9. वाह: बहुत सुन्दर..शुभकामनाएं..

    उत्तर देंहटाएं
  10. गिरगिटान ने गिलट से, गिला किया है दूर |
    गिरहबाज गोते लगा, मजा करे भरपूर |
    मजा करे भरपूर, चूर कलई करवा कर |
    पद-मद चढ़ा शुरूर, चना थोथा बजवाकर |
    पर कलई जिस रोज, खुलेगी रविकर तेरी |
    *गिलगिल मार भागे, नहीं किंचित भी देरी |

    *घड़ियाल / मगरमच्छ

    उत्तर देंहटाएं
  11. पर कलई जिस रोज, खुलेगी रविकर तेरी |
    *गिलगिल मार भगाय, नहीं किंचित भी देरी |

    *घड़ियाल / मगरमच्छ

    उत्तर देंहटाएं
  12. “रूप” बदला है जमाने के लिए, केंचुली से खादी की,
    हम हैं विषधर वही पुराने से, देश में हम जहर उगलते हैं
    प्रजा तंत्र की माता कुर्सी ,
    कैसी है ये विमाता कुर्सी
    साथ साल की माता कुर्सी .
    अच्छी रचना है शाष्त्री जी व्यंग्य ही व्यंग्य .

    उत्तर देंहटाएं
  13. “रूप” बदला है जमाने के लिए, केंचुली से खादी की,
    हम हैं विषधर वही पुराने से, देश में हम जहर उगलते हैं
    बहुत सुन्दर..शुभकामनाएं..

    उत्तर देंहटाएं

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