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रविवार, 27 मई 2012

"बदल जाते तो अच्छा था" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


समय के साथ में हम भी, बदल जाते तो अच्छा था।
घनी ज़ुल्फों के साये में, ग़ज़ल गाते तो अच्छा था।

सदाएँ दे रहे थे वो, अदाओं से लुभाते थे,
चटकती शोख़ कलियों पर, मचल जाते तो अच्छा था।

पुरातनपंथिया अपनी, बनी थीं राह का रोड़ा,
नये से रास्तों पर हम, निकल जाते तो अच्छा था।

मगर बन गोश्त का हलवा, हमें खाना नहीं आया,
सलीके से गरीबों को, निगल जाते तो अच्छा था।

मिली सौहबत पहाड़ों की, हमारा दिल हुआ पत्थर,
तपिश से प्रीत की हम भी, पिघल जाते तो अच्छा था।

जमा था रूप का पानी, हमारे घर के आँगन में,
सुहाने घाट पर हम भी, फिसल जाते तो अच्छा था।

15 टिप्‍पणियां:

  1. क्या बात है!!
    आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 28-05-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-893 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  2. मगर बन गोश्त का हलवा, हमें खाना नहीं आया,
    सलीके से गरीबों को, निगल जाते तो अच्छा था। लाजवाब शेर। बधाई इस सुन्दर गज़ल के लिये।

    उत्तर देंहटाएं
  3. उन्हें देखकर सम्हल जाते तो अच्छा था...

    उत्तर देंहटाएं
  4. उन्हें देखकर सम्हल जाते तो अच्छा था...

    सुंदर प्रस्तुति,,,,,

    RECENT POST ,,,,, काव्यान्जलि ,,,,, जिस्म महक ले आ,,,,,

    उत्तर देंहटाएं
  5. लाजबाब ,लाजबाब ,लाजबाब ग़ज़ल

    उत्तर देंहटाएं
  6. you ok steven sorry iv took so long i think this is the web address
    filing address , there very helpfull ,tell them H hemtom give you there number

    उत्तर देंहटाएं
  7. जमा था “रूप” का पानी, हमारे घर के आँगन में,
    सुहाने घाट पर हम भी, फिसल जाते तो अच्छा था।
    रोमांच से भरपूर चित्त लुभाऊ रचना ,गर हम भी लिख पाते तो कितना अच्छा था .
    और यहाँ भी दखल देंवें -
    ram ram bhai
    सोमवार, 28 मई 2012
    क्रोनिक फटीग सिंड्रोम का नतीजा है ये ब्रेन फोगीनेस
    http://veerubhai1947.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं
  8. दिखाई राह कितनों को, जगा सोवे हुवे मानव -
    भलाई देश की करके, नया यह राग क्यूँ छेड़ा ?

    उत्तर देंहटाएं
  9. अजब हुए बदलाव हले, परिवर्तन की आड़|
    फूल दिखा कर महकते,डी काँटों की बाड़||

    उत्तर देंहटाएं

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