रिश्ते-नाते, आपसदारी, कलयुग में व्यापार हो गये। पगड़ी पर जो दाग लगाते, बे-गैरत सरदार हो गये।। असरदार हो गये किनारे, फिरते दर-दर, मारे-मारे, खुद्दारी की माला जपते, माली अब गद्दार हो गये।। मन्त्री-सन्त्री और विधायक, खुलेआम कानून तोड़ते, दूध-दही की रखवाली में, बिल्ले पहरेदार हो गये। नैतिक और अनैतिकता से, आय-आय कैसे भी आये, घोटालों में लिप्त धुरन्धर, सत्ता के हकदार हो गये। अपने होठों को सी लेना, जनता की ये लाचारी है, रोटी-रोजी के बदले में, भाषण लच्छेदार हो गये। कहीं कीच में कमल खिला है, कहीं हाथ को राज मिला है, मौन हो गये कर्म यहाँ पर, मुखरित अब अधिकार हो गये। |
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जब रक्षक ही भक्षक हो जायें..
जवाब देंहटाएंआज की सच्चाई ....
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंनेता,चोर,और तनखैया, सियासती भगवांन हो गए
जवाब देंहटाएंअमरशहीद मातृभूमि के, गुमनामी में आज खो गए,
भूल हुई शासन दे डाला, सरे आम दु:शाशन को
हर चौराहा चीर हरन है, व्याकुल जनता राशन को,
मन्त्री-सन्त्री और विधायक, खुलेआम कानून तोड़ते,
जवाब देंहटाएंदूध-दही की रखवाली में, बिल्ले पहरेदार हो गये।……सच्चाई को बखूबी उकेरा है।
रिश्ते-नाते, आपसदारी, कलयुग में व्यापार हो गये।
जवाब देंहटाएंपगड़ी पर जो दाग लगाते, बे-गैरत सरदार हो गये।।
जले पर नमक छिड़क दिया आपने , बहुत सुन्दर !
bahut sundar dohe laajabaab
जवाब देंहटाएंसब कुछ ऐसा ही हो रहा है और हम टुकर टुकर देख रहे है!...आपने यथार्थ प्रस्तुत किया है...आभार!
जवाब देंहटाएंजोरदार लिखा है आपने..वाह!
जवाब देंहटाएंआज की सियासत पर करारा व्यंग्य...
जवाब देंहटाएंवाह क्या खूब लिखा हैं
जवाब देंहटाएंरखवाली वाला ही ...डाकू बन कर लूटने चला हैं...
ऐसे ग़द्दारों से देश को बचाओ भगवान!
जवाब देंहटाएंबिल्ले पहरेदार हो गये।
जवाब देंहटाएंसौ बात की एक बात
बहुत ही लाजवाब शास्त्री जी ...
जवाब देंहटाएंकमाल की रचना ... व्यंग के साथ सचाई लिखी है आपने ... नमस्कार ...