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गुरुवार, 28 जून 2012

"अन्तरजाल हुआ है तन" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


कम्प्यूटर बन गई जिन्दगी, अन्तरजाल हुआ है तन।
जालजगत के बिना कहीं भी, लगता नहीं हमारा मन।।

जंगल लगता बहुत सुहाना, पर्वत लगते हैं अच्छे,
सीधी-सादी बातें करते, बच्चे लगते हैं अच्छे,
सुन्दर-सुन्दर सुमनों वाला, लगता प्यारा ये उपवन।
जालजगत के बिना कहीं भी, लगता नहीं हमारा मन।।

सुख की बातें-दुख की बातें, बेबाकी से देते हैं,
भावनाओं के सम्प्रेषण से, अपना मन भर लेते हैं.
आभासी दुनिया में मिलता, हमको सुख और चैन-अमन।
जालजगत के बिना कहीं भी, लगता नहीं हमारा मन।।

ग़ाफ़िल, रविकर, भ्रमर, यहाँ पर सुरभिसुमन खिलाते हैं,
उल्लू और मयंक निशा में, विचरण करने आते हैं,
पंकहीन से कमल सुशोभित करते, बगिया और चमन।
जालजगत के बिना कहीं भी, लगता नहीं हमारा मन।।

उड़नतश्तरी दिख जाती है, ताऊ नजर नहीं आता,
अदा-सदा, वन्दना-कनेरी, महकाती जातीं उपवन।
जालजगत के बिना कहीं भी, लगता नहीं हमारा मन।।

25 टिप्‍पणियां:

  1. वाह वाह शास्त्री जी आज तो सभी को समाहित कर लिया बहुत सुन्दर उपवन सजाया है सच आनन्द आ गया । ये सिर्फ़ आप ही कर सकते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  2. ...बहुत सुन्दर काव्यमय भावोक्ति!

    उत्तर देंहटाएं
  3. बढ़िया है गुरु जी ।

    बधाई ।।

    यहीं मिले हैं चाचा ताऊ, दीदी बुआ बेटियां गुरुवर ।
    भाई बेटा मित्र भतीजा, व्यवसायी गुरुभाई टीचर ।।

    एडवोकेट मीडिया पर्सन, नौकर मालिक बैंकिंग अफसर ।
    पब्लीशर एजेंट सिनेमा, तरह तरह के कई करेक्टर ।।
    हास्य
    मिला शेर को सवा शेर फिर, एक बहेलिया कई कबूतर ।
    बड़े बाप हैं यहाँ कई तो, मिला नहीं पर सच्चा पुत्तर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सच कहा है...बहुत सुन्दर रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह ... बहुत ही बढि़या ... भावमय करती पोस्‍ट ...
    आभार

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपने सच कहा,,,,,
    जालजगत के बिना कहीं भी, लगता नहीं हमारा मन।।

    भावमय,सुंदर रचना,,,,,

    MY RECENT POST काव्यान्जलि ...: बहुत बहुत आभार ,,

    उत्तर देंहटाएं
  7. जाल-जगत का जाल है ऐसा, सब फंसने को सब तैयार
    कविता, ग़ज़ल कहानी कह लो, या बाँटों अपने विचार

    काव्य सुधा की झील बना कर, कर देते हमें दंग
    डाक्टर भी हैं, मास्टर भी हैं, रूपचन्द्र शास्त्री मयंक !

    आपका आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत अच्छी प्रस्तुति!

    इस प्रविष्टी की चर्चा शुक्रवारीय के चर्चा मंच पर भी होगी!

    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं





  9. आदरणीय शास्त्री जी
    प्रणाम !

    कमाल का गीत लिखा है…
    कम्प्यूटर बन गई जिन्दगी, अन्तरजाल हुआ है तन।
    जालजगत के बिना कहीं भी, लगता नहीं हमारा मन।।


    आपकी लेखनी हमेशा कुछ नया करती ही रहती है …
    हार्दिक शुभकामनाएं !
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

    उत्तर देंहटाएं
  10. बडा सुंदर गीत है , मन की भावनाओ को व्यक्त करता हुआ । आज के समय में यही हो रहा है

    उत्तर देंहटाएं
  11. सुख की बातें-दुख की बातें, बेबाकी से देते हैं,
    भावनाओं के सम्प्रेषण से, अपना मन भर लेते हैं.
    आभासी दुनिया में मिलता, हमको सुख और चैन-अमन।
    जालजगत के बिना कहीं भी, लगता नहीं हमारा मन।।

    सुख की बातें-दुख की बातें, बेबाकी से देते हैं,
    भावनाओं के सम्प्रेषण से, अपना मन भर लेते हैं.
    आभासी दुनिया में मिलता, हमको सुख और चैन-अमन।
    जालजगत के बिना कहीं भी, लगता नहीं हमारा मन।।
    सब कुछ मिलता जाल जगत में ,
    पूरी हलुवा जाल जगत में ,
    जितना डालो उतना मीठा, मिलता भैया ,
    जाल जगत में .
    बहुत ही उत्कृष्ट प्रस्तुति है शास्त्री जी की .

    उत्तर देंहटाएं
  12. रचना बहुत अच्छी है।
    इस जाल में हम नहीं फंसे दिखे। :)

    उत्तर देंहटाएं
  13. हम सबको आपस में जोड़ता जाल.... :)

    उत्तर देंहटाएं
  14. सुख की बातें-दुख की बातें, बेबाकी से देते हैं,
    भावनाओं के सम्प्रेषण से, अपना मन भर लेते हैं.
    आभासी दुनिया में मिलता, हमको सुख और चैन-अमन।
    जालजगत के बिना कहीं भी, लगता नहीं हमारा मन।।

    वाह....वाह...!

    उत्तर देंहटाएं
  15. सभी ब्लॉगर्स के मन की बात कह दिया आपने...सुंदर रचना !!

    उत्तर देंहटाएं
  16. डाक्टर साहब,
    अंतर्जाल के हर दीवाने की मन की बात को आपने क्या खूब अंदाज़ दिया है.....! वाह ...!!!

    उत्तर देंहटाएं
  17. मनोज जी आप नहीं फंसे
    लेकिन उल्लू को फंसाया है
    लगता है शास्त्री जी ने
    आपके लिये आदमियों के साथ
    निमंत्रण कहीं छपवाया है ।

    आभारी हूँ उल्लू को साथ में रखने के लिये
    नहीं तो मनहूसियत को कौन संभालने की हिम्मत करता है ।

    उत्तर देंहटाएं
  18. आपकी सुन्दर प्रस्तुति से
    हम रह जाते हैं सदा ही दंग

    रवि का लटका, अदा का झटका
    जमा रहें हैं खूब ही रंग

    जाल जगत में मिल जाता है
    सबको मनचाहा सत्संग

    खूबसूरत प्रस्तुति के लिए आभार,शास्त्री जी.

    उत्तर देंहटाएं

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