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रविवार, 10 जून 2012

ठण्डे रस का भरा माल था (सहारा समय उ.प्र. उत्तराखण्ड पर)

न्यूज चैनल सहारा समय उ.प्र. उत्तराखण्ड पर 
आज 10-06-2012 को 
मेरी इस कविता को सराहा गया है!

जब गरमी की ऋतु आती है!
लू तन-मन को झुलसाती है!! 
watermelons-5556
तब आता तरबूज सुहाना!
ठण्डक देता इसको खाना!! 

यह बाजारों में बिकते हैं!
फुटबॉलों जैसे दिखते हैं!! 
एक रोज मन में यह ठाना!
देखें इनका ठौर-ठिकाना!! 

पहुँचे जब हम नदी किनारे!
बेलों पर थे अजब नजारे!! 
Watermelon field prachi
कुछ छोटे कुछ बहुत बड़े थे!
जहाँ-तहाँ तरबूज पड़े थे!! 

इनमें से था एक उठाया!
बैठ खेत में इसको खाया!! 
Watermelon
इसका गूदा लाल-लाल था!
ठण्डे रस का भरा माल था!!

21 टिप्‍पणियां:

  1. वाह!!!

    सुन्दर रसीली रचना
    :-)

    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  2. एक सामान्य विषय को आपने कितनी खूबसूरती के साथ काव्य में ढाला है...वाकई यह सराहनीय है!...बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  3. रस से भरी रचना को पढ़कर आनंद आ गया !

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह ...बधाई शास्त्री जी ...

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत -बहुत बधाई सर..
    सुन्दर रचना....
    :-)

    उत्तर देंहटाएं
  6. ठण्डे रस का भरा माल था!! wah kya maza aya hoga.....

    उत्तर देंहटाएं
  7. सच मे सराहे जाने योग्य है…………रसभरी रचना

    उत्तर देंहटाएं
  8. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  9. क्या बात है!!
    आपके इस सुन्दर प्रविष्टि का लिंक कल दिनांक 11-06-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगा। सादर सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  10. इसका गूदा लाल-लाल था!
    ठण्डे रस का भरा माल था!!

    बाल गीत ,फलों का मीत
    शास्त्री जी हैं ,सबके मीत
    इनकी भैया सबसे प्रीत .
    कोई सके न इनसे जीत .

    उत्तर देंहटाएं
  11. पहले तो बधाई...
    प्रभू आखिर वाला चित्र क्यों लगाया... अब तरबूज खाए बिना मन नहीं मान रहा... कल ही लाना पड़ेगा...

    उत्तर देंहटाएं

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