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मंगलवार, 12 जून 2012

"पुराने जेवरातों में, नगीने जड़ नहीं सकते" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


मुहब्बत की इबारत को, कभी वो पढ़ नही सकते।
पुराने जेवरातों में, नगीने जड़ नहीं सकते।।

सफीना चलते-चलते ही, भँवर में फँस गया अपना,
उन्हें मिलने की आदत है, मगर हम बढ़ नही सकते।

समर में इश्क के हम तो, बिना हथियार के उतरे,
उन्हें भिड़ने की आदत है, मगर हम लड़ नही सकते।

जरा सी मय को पीकर, वो तो पहुँचे आसमानों में,
उन्हें उड़ने की आदत है, मगर हम चढ़ नही सकते।

हमारा रूप देखा है, किसी ने दिल नहीं देखा,
बहुत जज्बात ऐसे हैंजिन्हें हम गढ़ नही सकते।।

21 टिप्‍पणियां:

  1. हमारा “रूप” देखा है, किसी ने दिल नहीं देखा,
    बहुत जज्बात ऐसे हैं, जिन्हें हम गढ़ नही सकते।।

    वाह ,,,, बहुत ही सुंदर रचना,,,,,

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत खुबसूरत रचना...शास्त्री जी...आभार..

    उत्तर देंहटाएं
  3. हमारा “रूप” देखा है, किसी ने दिल नहीं देखा,
    बहुत जज्बात ऐसे हैं, जिन्हें हम गढ़ नही सकते।।

    मोहब्बत करतें हैं हम भी, मगर हम कह नहीं सकते
    जिगर में दर्द अपने भी ,मगर हम कह नहीं सकते
    सितम तुम जितने ढालो ,मगर कुछ कह नहीं सकते
    अच्छी रचना है .शास्त्री जी .....

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर सी ग़ज़ल के लिए आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  5. समर में इश्क के हम तो, बिना हथियार के उतरे,
    उन्हें भिड़ने की आदत है, मगर हम लड़ नही सकते ...

    क्या बात है ... इश्क में तो ऐसा होता है ... वो लड़ते हैं ... हम सहते हैं ... यही इश्क है ... नमस्कार शास्त्री जी ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. बड़ी गहरी बातें कहीं हैं आपने..

    उत्तर देंहटाएं
  7. वाह! बहुत ही बेहतरीन गजल!! हर शेर लाजवाब।

    उत्तर देंहटाएं
  8. समर में इश्क के हम तो, बिना हथियार के उतरे,
    उन्हें भिड़ने की आदत है, मगर हम लड़ नही सकते।
    बहुत खूब.....
    पूरी ग़ज़ल ही बेहतरीन है

    उत्तर देंहटाएं
  9. समर में इश्क के हम तो, बिना हथियार के उतरे,
    उन्हें भिड़ने की आदत है, मगर हम लड़ नही सकते।..............सही कहा ,एक दम सही

    उत्तर देंहटाएं
  10. मित्रों चर्चा मंच के, देखो पन्ने खोल |

    पैदल ही आ जाइए, महंगा है पेट्रोल ||

    --

    बुधवारीय चर्चा मंच

    उत्तर देंहटाएं
  11. वाह वाह वाह ………क्या खूब गज़ल है ।

    उत्तर देंहटाएं
  12. हमारा “रूप” देखा है, किसी ने दिल नहीं देखा,
    बहुत जज्बात ऐसे हैं, जिन्हें हम गढ़ नही सकते।।

    बहुत बारीक-सी कहन...मन को छूने वाली...
    हार्दिक बधाई...

    उत्तर देंहटाएं
  13. हमारा “रूप” देखा है, किसी ने दिल नहीं देखा,
    बहुत जज्बात ऐसे हैं, जिन्हें हम गढ़ नही सकते।...

    उम्दा ख्याल, उम्दा रचना

    उत्तर देंहटाएं

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