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शनिवार, 2 जून 2012

"दो जून की रोटी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


ज़रूरत बढ़ गईँ इतनी, हुई है ज़िन्दग़ी खोटी।
बहुत मुश्किल जुटाना है, यहाँ दो जून की रोटी।।

नहीं ईंधन मयस्सर है, हुई है गैस भी महँगी,
पकेगी किस तरह बोलो, यहाँ दो जून की रोटी।

बहुत ऊँचे हुए हैं भाव, अब तो दाल-आटे के,
गरीबी में हुई भारी, यहाँ दो जून की रोटी।

अज़ब अन्धेर नगरी है, टके की कुछ नहीं कीमत,
हुई है जान से महँगी, यहाँ दो जून की रोटी।

लगा है रूप का मेला, मुखौटों की नुमायश है,
मिली अस्मत के बदले में, यहाँ दो जून की रोटी।

13 टिप्‍पणियां:

  1. मिली अस्मत के बदले में, यहाँ दो जून की रोटी।
    बढ़िया प्रस्तुति,सुंदर रचना,,,,,

    RESENT POST ,,,, फुहार....: प्यार हो गया है ,,,,,,

    उत्तर देंहटाएं
  2. अब तो जिन्दगी बस दो जून की रोटियों में ही सिमट कर रह गयी है,
    कहाँ से काटें , कहाँ से लाये, जिन्दगी को चलाने के लिए रकम मोटी मोटी.

    उत्तर देंहटाएं
  3. सामयिक रचना है ...बिल्कुल सही कहा है आपने...

    उत्तर देंहटाएं
  4. दो जून को भेजी (पोस्ट की) गई यह दो जून की रोटी बहुत पसंद आई।

    उत्तर देंहटाएं
  5. लगा है “रूप” का मेला, मुखौटों की नुमायश है,
    मिली अस्मत के बदले में, यहाँ दो जून की रोटी।
    बहूत हि सही बात कही है आपने...
    सार्थक सुंदर रचना....

    उत्तर देंहटाएं
  6. आज के दौर की विवशता का सटीक बयान
    बहुत सुन्दर ग़ज़ल सर

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत ऊँचे हुए हैं भाव, अब तो दाल-आटे के,
    गरीबी में हुई भारी, यहाँ दो जून की रोटी ..

    सच कहा है शास्त्री जी ... इस दो जून की रोटी कों आज कितने तरसते हैं ...

    उत्तर देंहटाएं
  8. हल बदहाल.ज़िन्दगी बेहाल,
    दो जून रोटी भी मिल जाये तो
    ज़िन्दगी हो जाये निहाल,
    सत्य को बताती,घाव को सहलाती ,सुन्दर अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  9. चांद-तारे तो दिखा दिये,दो जून रोटी ने,
    देखिये,आगे-आगे होता है क्या?

    उत्तर देंहटाएं

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