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शुक्रवार, 22 जून 2012

"खोलो मन का द्वार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सुबह हुई अब तो उठो, खोलो मन का द्वार।
करके पूजा जाप को, लो बुहार घर-बार।१।

सुथरे तन में ही रहे, निर्मल मन का वास।
मोह और छलछद्म भी, नहीं फटकता पास।२।

श्रम से अर्जित आय से, पूरी होती आस।
सागर के जल से कभी, नहीं मिटेगी प्यास।३।

चलना ही है ज़िन्दग़ी, रुकना तो हैं मौत।
सूरज जग रौशन करे, टिम-टिम हों खद्योत।४।

13 टिप्‍पणियां:

  1. सुबह हुई अब तो उठो, खोलो मन का द्वार।
    करके पूजा-जाप को, लो बुहार घर-बार।१।

    सुथरे तन में ही रहे, निर्मल मन का वास।
    मोह और छलछद्म भी, नहीं फटकता पास।२।

    वाह शास्त्री जी बहुत गहन अर्थ समेटे सार्थक दोहे

    उत्तर देंहटाएं
  2. शिक्षाप्रद दोहे |
    निकम्मों को न मोहे |
    सादर ||

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बढ़िया ...!!

    उत्कृष्ट अभिव्यक्ति ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुन्दर, स्वच्छ, सरल कविता, जो अच्छी तरह बुहारे हुए स्वच्छ निर्मल मन से लिखी गयी है...

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुबह हुई अब तो उठो, खोलो मन का द्वार।
    करके पूजा-जाप को, लो बुहार घर-बार।१।

    सुंदर दोहे...शिक्षाप्रद...

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुबह हुई अब तो उठो, खोलो मन का द्वार।
    करके पूजा जाप को, लो बुहार घर-बार...

    Very motivating...

    .

    उत्तर देंहटाएं
  7. प्रेरक सटीक सार्थक दोहे,

    उत्तर देंहटाएं
  8. अत्यंत सुन्दर सार्थक दोहे....
    सादर

    उत्तर देंहटाएं

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