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शनिवार, 30 जून 2012

"हमारे घर में रहते हैं, हमें चूना लगाते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


जिन्हें पाला था नाज़ों से, वही आँखें दिखाते हैं।
हमारे दिल में घुसकर वो, हमें नश्तर चुभाते हैं।।

जिन्हें अँगुली पकड़ हमने, कभी चलना सिखाया था,
जरा सा ज्ञान क्या सीखा, हमें पढ़ना सिखाते हैं।

भँवर में थे फँसे जब वो, हमीं ने तो निकाला था,
मगर अहसान के बदले, हमें चूना लगाते हैं।

हमें अहसास होता है, बड़ी है मतलबी दुनिया,
गधे को बाप भी अपना, समय पर वो बनाते हैं।

नहीं है रूप से मतलब, नहीं है रंग की चिन्ता,
अगर चांदी के जूते हो, तो सिर पर वो बिठाते हैं।

25 टिप्‍पणियां:

  1. उफ़ शास्त्री जी आज तो हर घर का सत्य लिख दिया घर घर की कहानी है …………बहुत जबरदस्त्।

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  2. लाजबाब बात कही शास्त्री जी ! एकदम सत्य !

    उत्तर देंहटाएं
  3. Sundar aur kai jaghon par fit hone wali rachna..behtareen

    उत्तर देंहटाएं
  4. नहीं है “रूप” से मतलब, नहीं है रंग की चिन्ता,
    अगर चांदी के जूते हो, तो सिर पर वो बिठाते हैं।

    इस ज़माने की हकीकत तो यही है !

    उत्तर देंहटाएं
  5. आज मतलबी दुनिया में कोई किसी यार नही,
    मतलब के है रिश्ते नाते करता कोई प्यार नही,
    पद पैसा है पास तुम्हारे, सब पीछे पीछे आयेगें
    अपना काम निकालने को,सब रिश्ते बन जायेगें,,,,,,

    सटीक प्रस्तुति,,,,,,

    उत्तर देंहटाएं
  6. भँवर में थे फँसे जब वो, हमीं ने तो निकाला था,
    मगर अहसान के बदले, हमें चूना लगाते हैं ..

    बहुत खूब .. सच कों हूबहू लिखा है ... मज़ा आ गया हर शेवर पढ़ने के बाद ... नमस्कार शास्त्री जी ...

    उत्तर देंहटाएं
  7. एकदम सटीक बात..
    बेहतरीन प्रस्तुति....
    :-)

    उत्तर देंहटाएं
  8. सुन्दर प्रस्तुति आपकी, मनभावन उत्कृष्ट |
    स्वीकारो शुभकामना, अति-रुचिकर है पृष्ट |
    अति-रुचिकर है पृष्ट, सृष्ट की रीत पुरानी |
    कहें गधे को बाप, नहीं यह गलत बयानी |
    पर पाए संताप, नकारे गधा अगरचे |
    करे आर्त आलाप, बुद्धि वह नाहक खरचे ||

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  9. कमाल की दृष्टि और रेखांकन

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  10. सार्थकता लिए हुए सटीक लेखन ...आभार

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  11. जिन्हें अँगुली पकड़ हमने, कभी चलना सिखाया था,
    जरा सा ज्ञान क्या सीखा, हमें पढ़ना सिखाते हैं।

    अरे साहब कैसा ज्ञान इनके पास तो पूरी सूचना भी नहीं होती .पुत्र भले सूचना वान मिले वधु पुत्र के पास तो वह भी नहीं होती ,होती है सिर्फ एक सनक ,सब चीज़ पे कब्जा ज़माने की
    बेहूदे पन की हद तक .

    उत्तर देंहटाएं
  12. हँसा रहा है चित्र पर, रुला गये हैं भाव |
    कैसी अंधी दौड़ है , कैसा ये बदलाव ||

    नये जमाने के नये चलन को बड़ी सरलता से कह गये.न जाने कब आँख खुलेगी ???????

    बाँधी पट्टी आँख पर करने चला इलाज
    बाप न मारी मेंढकी , बेटा तीरंदाज
    बेटा तीरंदाज , गधे को बाप बनाता
    रिश्ते-नाते भूल, जोड़ता धन से नाता
    सतयुग उजड़ा चली,क्रूर कलियुग की आँधी
    ये है अंधी दौड़ , सभी ने पट्टी बाँधी ||

    उत्तर देंहटाएं
  13. आज तो सच्चाई के सागर में डुबो डुबो कर कलम चलाई है वाह बहुत सुन्दर प्रस्तुति अंतिम लाइन का तो कोई जबाब नहीं

    उत्तर देंहटाएं
  14. कही बातें सभी सच्ची, यही है हाल दुनिया का,
    जवां औलाद होकर आँख बापू को दिखाते हैं.


    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  15. तस्वीर के साथ गज़ब ढा रही है गज़ल.

    उत्तर देंहटाएं
  16. हम ऐसी कुछ किताबें ,क़बिले ज़ब्ती समझते हैं ,
    कि जिनको पढ़ के बेटे बाप को खब्ती समझते हैं !

    उत्तर देंहटाएं

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