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शनिवार, 16 जून 2012

"मौत से सब बेख़बर हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


देखते सब लोग हैं शमशान को,
किन्तु कितने मौत से सब बेख़बर हैं।
आयेंगे चौराहे और दोराहे भी,
किन्तु सबकी एक सी होती डगर हैं।।

जिन्दगी में स्वप्न सुन्दर हैं सजाये,
गगनचुम्बी भवन सुन्दर हैं बनाये,
साथ तन नही जायेगा, तन्हा सफर हैं।
किन्तु कितना मौत से सब बेख़बर हैं।।

बन्धु और बान्धव मिलाने खाक में ही जायेंगे,
देह कुन्दन कनक सी सब राख ही हो जायेंगे।
खेलते हैं खेल को ज़िन्दा शज़र हैं।
किन्तु कितना मौत से सब बेख़बर हैं।।

धार में दरिया की सारी अस्थियाँ बह जायेंगी,
सब तमन्नाएँ धरी की धरी ही रह जायेंगी,
स्वर्ग की सरिता में, बेनामी भँवर हैं।
किन्तु कितना मौत से सब बेख़बर हैं।।

21 टिप्‍पणियां:

  1. शाश्वत सत्य को बयाँ करतीबेह्द उम्दा प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  2. एकदम सत्य बात !
    छोड़ देना है एक दिन सब कुछ यही पर,
    फिर भी दुष्ट नित लूट से भर रहे घर है !

    उत्तर देंहटाएं
  3. शाश्वत सत्य ..यही है जीवन..

    उत्तर देंहटाएं
  4. एक ऐसा कटु सत्य, जिसे नाकारा नहीं जा सकता!..सुन्दर रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  5. कलयुग ने है अपना जाल फैलाया ,
    सब को मोह जाल में फंसाया ,
    शमसान में मृत देह देख कर,
    इंसान के मन में ख्याल आता है ,
    सब कुछ यहीं तो छोड़ जाना है ,
    कोई कभी कुछ लेकर जाता है !!
    आता है जब शमशान के बाहर ,
    चंचल मन फिर घूम जाता है ,
    अरे भाई बहुत देर हो गयी ,
    और जरुरी काम याद आ जाता है !!

    उत्तर देंहटाएं
  6. आध्यात्मिक संदेश देती अच्छी रचना।
    सब ठाठ यहीं रह जाएगा, जब लाद चलेगा बंजारा...!

    उत्तर देंहटाएं
  7. यही जीवन का कटु सत्य है,,,,

    बहुत बेहतरीन सुंदर रचना के लिये बधाई,,,,,शास्त्री जी,

    RECENT POST ,,,,,पर याद छोड़ जायेगें,,,,,

    उत्तर देंहटाएं
  8. बन्धु और बान्धव मिलाने खाक में ही जायेंगे,
    देह कुन्दन कनक सी सब राख ही हो जायेंगे.... कटु सत्य

    उत्तर देंहटाएं
  9. बिल्‍कुल सच कहा है आपने ... बेहतरीन प्रस्‍तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  10. बुद्ध खोज का एक आधार है यह दृश्य..

    उत्तर देंहटाएं
  11. शास्वत सत्य है ये
    केवल आँख फेर लेते हैं हम.....
    बेहद शसक्त अभिव्यक्ति
    सादर !!!

    उत्तर देंहटाएं
  12. बढ़िया पंक्तियाँ
    बढ़िया भाव -
    दर्शन-

    मौत से जो सौत सी हम डाह करते |
    जिन्दगी की बेवजह परवाह करते |

    सत्य शाश्वत एक ही रविकर समझ-
    हर घडी हर सांस में क्यूँ आह भरते ||

    उत्तर देंहटाएं
  13. जिन्दगी में स्वप्न सुन्दर हैं सजाये,
    गगनचुम्बी भवन सुन्दर हैं बनाये,
    साथ तन नही जायेगा, तन्हा सफर हैं।
    किन्तु कितना मौत से सब बेख़बर हैं।।
    स्वर्ग की सरिता में, बेनामी भँवर हैं।
    किन्तु कितना मौत से सब बेख़बर हैं।।
    फिर भी कितने लोग जीतें हैं यहाँ बेनामी खाते सी ज़िन्दगी ,
    रचना शास्त्रीजी की अचरज से भरी ,मौत का गर खौफ हो तो क्यों बने कोई राम लाल

    उत्तर देंहटाएं
  14. सत्य को उद्घाटित करती हुई रचना.बहुत अच्छी प्रस्तुति.

    उत्तर देंहटाएं
  15. तल्ख़ वास्तविकता – को सहज ढ़ंग से बेपर्द करती कविता मन में मंथन उत्पन्न करती है।

    उत्तर देंहटाएं

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