"प्यार करने का जमाना आ गया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
पत्थरों को गीत गाना आ गया है। लक्ष्य था मुश्किल, पहुँच से दूर था, साधना हमको निशाना आ गया है। मन-सुमन वीरान उपवन थे पड़े, पंछियों को चहचहाना आ गया है। हाथ लेकर हाथ में जब चल पड़े, साथ उनको भी निभाना आ गया है। ज़िन्दग़ी के जख़्म सारे भर गये, प्यार करने का जमाना आ गया है। जब चटककर “रूप” कलियों ने निखारा, साज गुलशन को बजाना आ गया है। |














