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सोमवार, 10 जून 2013

"नेताओं की तफरी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

शेरा के छोले
एक आने में
भरकर दोना  
अब शेरा तो रहा नहीं
उसका बेटा
10 रुपये में  बेच रहा है
सिर्फ आधा दोना
इतने पर भी
उसके हैं
कठिन गुजारे
और नेताओं के
हो रहे हैं वारे-न्यारे
आजादी का तोहफा
50 साल की उपलब्धियाँ
500 गुनी मँहगाई  
खुशहाली के बदले
तबाही ही तबाही
लोकतन्त्र का अर्थ
खुदगर्जी
जनता की अर्जी
शासन की मर्जी
पिता होता था प्रजा का
राजशाही में राजा
मगर लोकशाही ने
जनता का
बजा दिया है बाजा
चारों ओर
लूटमार, अफरा-तफरी  
यही तो है  
प्रजातन्त्र का रूप
नेताओं की तफरी

13 टिप्‍पणियां:

  1. ये लोक शाही तो राजशाही से गई बीती साबित हो रही है.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  2. mujhe na to lok shaahi samajh mein aatee hai aur naa hee raaj shaahi....samajh mein aa raha hai to bas ye chhole kee plate jiska naam shaayad "chhole-shaahi" ho sakta hai.... :-)

    उत्तर देंहटाएं
  3. पिता होता था प्रजा का
    राजशाही में राजा
    मगर लोकशाही ने
    जनता का
    बजा दिया है बाजा
    bilkul sahi kaha hai aapne .

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सही लिखा मयंक जी
    बुरा हाल है देश का .........
    बहुत सुन्दर लिखा

    उत्तर देंहटाएं
  5. सत्य का आईना दिखाती रचना

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार ११ /६ /१ ३ के विशेष चर्चा मंच में शाम को राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी वहां आपका स्वागत है

    उत्तर देंहटाएं
  7. बेशर्म नेताओं पर अच्छा व्यंग..ये प्रजातंत्र नहीं बल्कि पार्टीतंत्र है..इस हेतु पढें path04.blogspot.in पर मेरे विचार "प्रजातंत्र या पार्टीतंत्र"और सुझाव भी दें.

    उत्तर देंहटाएं
  8. लूटमार, अफरा-तफरी
    यही तो है
    प्रजातन्त्र का “रूप”
    नेताओं की तफरी
    सार्थक और बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!
    latest post: प्रेम- पहेली
    LATEST POST जन्म ,मृत्यु और मोक्ष !

    उत्तर देंहटाएं
  9. बेहतरीन ,सटीक यथार्थ की जोरदार प्रस्तुति ,

    उत्तर देंहटाएं

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