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शनिवार, 8 जून 2013

"मन हर्षित हो मुस्काये हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

सागर में से भर कर निर्मल जल को लाये हैं।
झूम-झूम कर नाचो-गाओ, बादल आये हैं।।

गरमी ने लोगों के तन-मन को झुलसाया है,
बहुत दिनों के बाद मेघ ने दरस दिखाया है,
जग की प्यास बुझाने को ये छागल लाये हैं।
झूम-झूम कर नाचो-गाओ, बादल आये हैं।।

नाच रहे पेड़ों के पत्ते, पुरवैया के झोंको से,
शीतल पवन दे रही दस्तक, खिड़की और झरोखों से,
खेत-बाग के व्याकुल-मन हर्षित हो मुस्काये हैं।
झूम-झूम कर नाचो-गाओ, बादल आये हैं।।

धरती की भर गयी दरारें, वर्षा के आने से,
खिले किसानों के चेहरे, नभ पर बादल छाने से,
अब हरियाली छा जायेगी, ये आस लगाये हैं।
झूम-झूम कर नाचो-गाओ, बादल आये हैं।।

14 टिप्‍पणियां:

  1. वाह आपने तो बहुत सुन्दर चित्र खींच दिया है मगर अभी यहाँ का मौसम नही बदला है :)

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  2. बहुत सुन्दर बादल हैं, बस बरस पड़ें.

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (09-06-2013) के चर्चा मंच पर लिंक
    की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...दिल्ली की गर्मी में ठंडी फुहार जैसा...

    उत्तर देंहटाएं
  5. बादल आये, संग लाये कितने सुख के दिन।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बादल के साथ गर्मी में फुहार ,शीतल पवन ,सुख के दिन,बहुत सुन्दर चित्र उकेर दिया

    उत्तर देंहटाएं
  7. हमारे यहां तो मौसम आपकी कविता जैसा होने लगा है.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  8. ऐसे ही बादलों का बेसब्री से इंतज़ार है। मनोरम चित्रण लिए सुंदर गीत।

    उत्तर देंहटाएं
  9. बादलों का स्‍वागत है...बहुत सुंदर लि‍खा

    उत्तर देंहटाएं

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