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शनिवार, 1 जून 2013

"मुकद्दर आजमाना चाहता है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

वो मुकद्दर आजमाना चाहता है 
चाँद-तारों को बुलाना चाहता है 

बिना मेहनत और मशक्कत के यहाँ 
वो लुटी जागीर पाना चाहता है 

लौ जलाई थी बुजुर्गों ने कभी जो 
आज वो शम्मा बुझाना चाहता है 

चाटकर जूठन विदेशी थालियों की 
वो सिकन्दर अब कहाना चाहता है 

सिल नहीं पाया अभी जो चाकेदामन 
देश की बिगड़ी बनाना चाहता है 

सिर्फ पन्नों को गिना है आज तक 
और वो फ़ाज़िल कहाना चाहता है 

 रूप में पागल हुआ वो इस कदर 
अपनी हस्ती को मिटाना चाहता है 

14 टिप्‍पणियां:

  1. चाटकर जूठन विदेशी थालियों की
    वो सिकन्दर अब कहाना चाहता है
    सिल नहीं पाया अभी जो चाकेदामन
    देश की बिगड़ी बनाना चाहता है
    .....सच आज देश में अपनी छोड़ देश की बिगड़ी बनाने वालों की कोई कमी नहीं
    बहुत बढ़िया सार्थक गजल

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही सुन्दर रचना, काश लोग समझ पाते कि वे क्या करना चाहते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  3. यह सबको समझ आये, यही कामना करते हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (02-06-2013) के चर्चा मंच 1263 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं

  5. सिल नहीं पाया अभी जो चाकेदामन
    देश की बिगड़ी बनाना चाहता है----

    बहुत सार्थक और सटीक बात कही है
    वाह बहुत खूब प्रस्तुति


    आग्रह है पढें
    तपती गरमी जेठ मास में---
    http://jyoti-khare.blogspot.in

    उत्तर देंहटाएं
  6. लौ जलाई थी बुजुर्गों ने कभी जो
    आज वो शम्मा बुझाना चाहता है sacchi bat ....

    उत्तर देंहटाएं
  7. Excelente post amigo, muchas gracias por compartirlo, da gusto visitar tu Blog.
    Te invito al mio, seguro que te gustará:
    http://el-cine-que-viene.blogspot.com/

    Un gran saludo, Oz.

    उत्तर देंहटाएं
  8. बेहतरीन प्रस्तुति आदरणीय......

    उत्तर देंहटाएं
  9. वाह वाह लाजवाब प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  10. बेहतरीन प्रस्तुति धन्यवाद !!

    उत्तर देंहटाएं

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