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गुरुवार, 20 जून 2013

"घर में पानी, बाहर पानी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

अतिवृष्टि

जब सूखे थे खेत-बाग-वन,
तब रूठी थी बरखा-रानी।
अब बरसी तो इतनी बरसी,
घर में पानी, बाहर पानी।।
बारिश से सबके मन ऊबे,
धानों के बिरुए सब डूबे,
कोप किसलिए ओ महारानी!
घर में पानी, बाहर पानी।।
दूकानों के द्वार बन्द हैं,
जीवन के आसार मन्द है,
राहें लगती हैं अनजानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।
आज घरों में चूल्हा सूना,
दूध बिना रोता है मुन्ना,
भूखी हैं दादी और नानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।
बाढ़ हो गयी है दुखदायी,
नगर-गाँव में मची तबाही,
वर्षा क्या तुमने है ठानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।

11 टिप्‍पणियां:

  1. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. jeevan dayani varsha apne roudra roop me hai sundar rachna ..

    उत्तर देंहटाएं
  3. सच्चाई को शब्दों में बखूबी उतारा है आपने आभार . ये है मर्द की हकीकत आप भी जानें संपत्ति का अधिकार -४.नारी ब्लोगर्स के लिए एक नयी शुरुआत आप भी जुड़ें WOMAN ABOUT MAN

    उत्तर देंहटाएं
  4. जब सूखे थे खेत-बाग-वन,
    तब रूठी थी बरखा-रानी।
    अब बरसी तो इतनी बरसी,
    घर में पानी, बाहर पानी।।

    Sacchi Baat !

    उत्तर देंहटाएं
  5. इसीलिये चार दिन जलसंस्थान ने नल में नहीं दिया पानी!
    सुंदर !

    उत्तर देंहटाएं

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