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रविवार, 9 जून 2013

“आज अपना पुराना गीत सुनने का मन है” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरे पति 
ने
बारिश शुरू होने पर,
"बादल" शीर्षक से यह गीत लिखा था। इसे मैं अपनी आवाज में
प्रस्तुत कर रही हूँ-
श्रीमती अमर भारती


बड़ी हसरत दिलों में थी, गगन में छा गये बादल।
हमारे गाँव में भी आज, चल कर आ गये बादल।।
 
गरज के साथ आयें हैं, बरस कर आज जायेंगे,
सुहानी चल रही पुरवा, सभी को भा गये बादल।
हमारे गाँव में भी आज, चल कर आ गये बादल।।
 
धरा में जो दरारें थी, मिटी बारिश की बून्दों से,
किसानों के मुखौटो पर, खुशी चमका गये बादल।
हमारे गाँव में भी आज, चल कर आ गये बादल।।
 
पवन में मस्त होकर, धान लहराते फुहारों में,
पहाड़ों से उतर कर, मेह को बरसा गये बादल।
हमारे गाँव में भी आज, चल कर आ गये बादल।।

13 टिप्‍पणियां:

  1. सौन्दर्य का अमृत बरसाते बादल, सुन्दर रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  2. धरा में जो दरारें थी, मिटी बारिश की बून्दों से,
    किसानों के मुखौटो पर, खुशी चमका गये बादल।
    हमारे गाँव में भी आज, चल कर आ गये बादल।।

    बहुत खुब...

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत खुब,बढ़िया

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    उत्तर देंहटाएं
  4. सुन्दर मधुर गीत,सादर आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुमधुर गीत को सस्वर प्रस्तुत करने के लिए आप दोनों को बधाई !

    उत्तर देंहटाएं
  6. गरज के साथ आयें हैं, बरस कर आज जायेंगे,
    सुहानी चल रही पुरवा, सभी को भा गये बादल।
    हमारे गाँव में भी आज, चल कर आ गये बादल।।
    bahut sundar

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत उम्दा मधुर गीत ,,,आप दोनों को बधाई ,,,,

    उत्तर देंहटाएं
  8. सुन्दर मधुर गीत,सादर आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  9. bahut hi sunder rachna hai ...................
    http://dhundhliyaden.blogspot.in/2013/06/blog-post_9.html#links

    उत्तर देंहटाएं
  10. सुंदर और मधुर गीत धन्यवाद!!

    उत्तर देंहटाएं

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