"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

गुरुवार, 27 जून 2013

"नेत्र शिव का खुल गया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आज भी पसरे हुए, बादल पहाड़ी गाँव में।
हो गये लाचार सारे, अब पहाड़ी गाँव में।।

डर गयी है धूप सुख की आज तो,
छा गयीं दुख की बदलियाँ आज तो,
भूख से व्याकुल हुए सब, अब पहाड़ी गाँव में।
हो गये लाचार सारे, अब पहाड़ी गाँव में।।

फट रहे बादल दरकती है धरा,
उफनती धाराओं ने जीवन हरा,
कुछ नहीं बाकी बचा है, अब पहाड़ी गाँव में।
हो गये लाचार सारे, अब पहाड़ी गाँव में।।

पाप का बोझा हिमालय क्यों सहे?
इसलिए घर-द्वार, देवालय बहे,
ज़लज़ला-तूफान आया, अब पहाड़ी गाँव में।
हो गये लाचार सारे, अब पहाड़ी गाँव में।।

पर्वतों में जब प्रदूषण घुल गया,
तीसरा तब नेत्र शिव का खुल गया,
मौत ने डेरा जमाया, अब पहाड़ी गाँव में।
हो गये लाचार सारे, अब पहाड़ी गाँव में।।

14 टिप्‍पणियां:

  1. यथार्थ का सम्पूर्ण चित्रण
    सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार गुरुवर ||

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. सन्नाटा पसड़ा पड़ा, सड़ता हाड़ पहाड़ |
      कलरव कल की बात है, गायब सिंह दहाड़ |
      गायब सिंह दहाड़, ताड़ अब कारस्तानी |
      कुदरत से खिलवाड़, करे फिर पानी-पानी |
      सुधरो नहीं सिधार, खाय झापड़ झन्नाटा |
      मद में माता मनुज, सन्न ताके सन्नाटा ||

      हटाएं
    2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥

      हटाएं
    3. सन्नाटा पसड़ा पड़ा, सड़ता हाड़ पहाड़ |
      कलरव कल की बात है, गायब सिंह दहाड़ |

      गायब सिंह दहाड़, ताड़ अब कारस्तानी |
      कुदरत से खिलवाड़, करे फिर पानी-पानी |

      सुधरो नहीं सिधार, खाय झापड़ झन्नाटा |
      मद में माता मनुज, सन्न ताके सन्नाटा ||

      हटाएं
  2. सही लिखा आपने, शुभकामनाएं.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  3. डर गयी है धूप सुख की आज तो,
    छा गयीं दुख की बदलियाँ आज तो,
    बढ़िया लिखा है ..

    उत्तर देंहटाएं
  4. उत्कृष्ट संजीदा और सामयिक प्रस्तुति .बहुत बहुत बधाई...

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  6. पर्वतों में जब प्रदूषण घुल गया,
    तीसरा तब नेत्र शिव का खुल गया,
    मौत ने डेरा जमाया, अब पहाड़ी गाँव में।
    हो गये लाचार सारे, अब पहाड़ी गाँव में।।।……………यथार्थ का सटीक वर्णन

    उत्तर देंहटाएं
  7. pahad me hui trasdi ka marmik varnan prastut kiya hai aapne .aabhar

    उत्तर देंहटाएं
  8. फट रहे बादल दरकती है धरा,
    उफनती धाराओं ने जीवन हरा..
    बहुत सही ...होनी कोई नहीं टाल सकता ..

    उत्तर देंहटाएं
  9. पाप का बोझा हिमालय क्यों सहे?
    इसलिए घर-द्वार, देवालय बहे,
    ज़लज़ला-तूफान आया, अब पहाड़ी गाँव में।
    हो गये लाचार सारे, अब पहाड़ी गाँव में।।

    बहुत सटीक अर्थ पूर्ण भावपूरित प्रासंगिक रचना .

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails