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शनिवार, 29 जून 2013

"आज बहुत है शोक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

तप करने के वास्ते, होते पावन धाम।
शंकर के आगार में, मस्ती का क्या काम।।

हुई भयंकर त्रासदी, क्रोधित हुए महेश।
नेत्र तीसरा जब खुला, साफ हुआ परिवेश।।

अँगड़ाई ली शैल ने, सब कुछ किया तबाह।
जो इसमें हैं बच गये, वो भी रहे कराह।।

खाना-दाना भी नहीं, नीड़ हो गये ध्वस्त।
शैलवासियों का हुआ, आज हौसला पस्त।।

विदा हुए जो जगत से, चले गये परलोक।
उनके जाने का हमें, आज बहुत है शोक।।

छेड़-छाड़ जब-जब हुई, तब-तब बिगड़े ढंग।
कुदरत करती सन्तुलन, दिखलाती निज रंग।।

सबके ही सहयोग से,  बनते बिगड़े काज।
तन-मन-धन से हम करें, मदद सभी की आज।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. इस महेश ने अपना तीसरा नेत्र खोल कर जैसा रौद्र रूप दिखाया है सभी भयभीत हो गये हैं ! उनके इस प्रलयंकारी तांडव ने समूचे उत्तराखंड को तो हिला ही दिया है स्वयं उनका आसान भी डोल गया है ! प्रभु शांत हों और अपने भक्तों पर कृपा करें यही प्रार्थना है !

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  2. सही संदेश देती रचना.

    रामराम.

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  3. बिल्कुल सही कहा आपने …………यही तो हुआ है ………सुन्दर रचना

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सही कहा आपने ............

    हम ही ज़िम्मेदार हैं ............अच्छा सन्देश दिया है

    जवाब देंहटाएं
  5. मेरी टिप्पणी नहीं दिखी

    जवाब देंहटाएं
  6. बहत सही कहा आपने

    सुन्दर सन्देश ............

    जवाब देंहटाएं
  7. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (30-06-2013) के चर्चा मंच 1292 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

    जवाब देंहटाएं
  8. बहुत सार्थक प्रस्तुति...

    जवाब देंहटाएं
  9. बहुत सार्थक ,सामयिक प्रस्तुति..

    जवाब देंहटाएं

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