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गुरुवार, 6 जून 2013

"वीरान गुलशन सजाकर दिखा तो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मुझे आज अपनी मुरलिया बना तो
तू एक बार होठों से मुझको लगा तो

संगीत को छेड़ दूँगी मैं दिलवर
तू इक बार मुझको उठाकर बजा तो  

सुनाऊँगी मैं मेघ मल्हार तुझको
सुराखों को तू कायदे से दबा तो

मैं कोयल सी चहकूँगी तेरे चमन में
तू वीरान गुलशन सजाकर दिखा तो

मैं मोहन की प्यारी हूँ मन मोह लूँगी
निराशा को तू अपने मन से भगा तो

मिरा रूप और रंग तेरे लिए है
सुरों की तू इक बार महफिल सजा तो

18 टिप्‍पणियां:

  1. इस वीराने में कोई तो सुर छेड़े..सुन्दर कविता।

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  4. शानदार गुरु जी बहुत ही बढ़िया

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  6. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

    चरखा चर्चा चक्र चल, सूत्र कात उत्कृष्ट ।

    पट झटपट तैयार कर, पलटे नित-प्रति पृष्ट ।

    पलटे नित-प्रति पृष्ट, आज पलटे फिर रविकर ।

    डालें शुभ शुभ दृष्ट, अनुग्रह करिए गुरुवर ।

    अंतराल दो मास, गाँव में रहकर परखा ।

    अतिशय कठिन प्रवास, पेश है चर्चा-चरखा ।

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  7. इस मुरलिया की धुन प्यारी लगी

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  8. आपकी यह सुन्दर रचना शनिवार 08.06.2013 को निर्झर टाइम्स (http://nirjhar-times.blogspot.in) पर लिंक की गयी है! कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

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  9. बहुत प्यारी रचना है..बधाई...महोदय, किसी की मुरलिया बनना और उस मुरलिया को साधना; दोनों ही कठिन कार्य हैं...और जब सब सध गया तो फिर क्या कहने??

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  10. बहुत प्यारी हिंदी ग़ज़ल कही आदरणीय शास्त्री जी मजा आ गया पढ़ के हार्दिक बधाई

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