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सोमवार, 1 मार्च 2010

“एक पुराना गीत” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)


"दिल किसी काम में नही लगता,
याद जब से तुम्हारी आयी है।


घाव रिसने लगें हैं सीने के,
पीर चेहरे पे उभर आयी है। 


साँस आती है, धडकनें गुम है,
क्यों मेरी जान पे बन आयी है।


गीत-संगीत बेसुरा सा है,
मन में बंशी की धुन समायी है।


मेरी सज-धज हैं, बेनतीजा सब,
प्रीत पोशाक नयी लायी है।


होठ हैं बन्द, लब्ज गायब हैं,
राज की बात है, छिपायी है।


चाहे कितनी बचाओ नजरों को,
इश्क की गन्ध छुप न पायी है।"

11 टिप्‍पणियां:

  1. साँस आती है, धडकनें गुम है,
    क्यों मेरी जान पे बन आयी है।
    बहुत सुन्दर रचना. होली की अनन्त शुभकामनायें.

    उत्तर देंहटाएं
  2. चाहे कितनी बचाओ नजरों को,
    इश्क की गन्ध छुप न पायी है।"
    सर्वप्रथम तो मेरी मान्यता है कि गीत कोई पुराना नही होता.
    बहुत प्यारी रचना

    उत्तर देंहटाएं
  3. घाव रिसने लगें हैं सीने के,
    पीर चेहरे पे उभर आयी है।

    वाह शास्त्री जी आनंद आ गया....क्या शेर है

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही सुंदर रचना
    आभार-
    साथ मे गुझिया रबड़ी मलाई
    आपको होली की घणी घणी बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  5. शास्त्रीजी,
    दिन बीता और होली बीती,
    रंग-अबीर की झोली रीती !
    मेरे वंदन पर विराम था,
    एक अमंगल ही प्रमाण था !!
    दोष-मुक्त हो हँस लेता हूँ,
    प्रणाम भेजकर खुश होता हूँ !!
    सादर--आ.

    उत्तर देंहटाएं
  6. गीत कभी पुराने नही होते । बहुत सुन्दर लगा गीत। धन्यवाद्

    उत्तर देंहटाएं
  7. purane mein bhi wo baat hoti hai jo naye mein nhi.........behad khoobsoorat geet.........dil ko chhoo gaya.

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुन्दर और प्यारी रचना !

    उत्तर देंहटाएं

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