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शनिवार, 20 मार्च 2010

“चलना ही है जीवन!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

जीवन पथ पर, आगे बढ़ते रहो हमेशा,
साहस से टल जायेंगी सारी ही उलझन।
नदी और तालाब, यही देते हैं सन्देशा,
रुकना तो सड़ना है, चलना ही है जीवन।।

पोथी पढ़ने से  जन पण्डित कहलाता है,
बून्द-बून्द मिलकर ही सागर बन जाता है,
प्यार रोपने से ही आता है अपनापन। 
रुकना तो सड़ना है, चलना ही है जीवन।।

सर्दी,गर्मी, धरा हमेशा सहती है,
अपना दुखड़ा नही किसी से कहती है,
इसकी ही गोदी में पलते हैं वन कानन।
रुकना तो सड़ना है, चलना ही है जीवन।।

शीतल-मन्द-सुगऩ्ध बयारें चलकर आतीं,
नभ से चल कर मस्त फुहारें जल बरसातीं,
चलने से ही स्वस्थ हमेशा रहता तन-मन।
रुकना तो सड़ना है, चलना ही है जीवन।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. पोथी पढ़ने से जन पण्डित कहलाता है,
    बून्द-बून्द मिलकर ही सागर बन जाता है,
    प्यार रोपने से ही आता है अपनापन।
    रुकना तो सड़ना है, चलना ही है जीवन।।
    BEHTREEN LAINE,AABHAR.

    उत्तर देंहटाएं
  2. जीवन पथ पर, आगे बढ़ते रहो हमेशा,
    साहस से टल जायेंगी सारी ही उलझन।
    सुन्दर सन्देश
    सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  3. जीवन का सन्देश देती मधुर कविता...!
    आभार !!
    सादर--आ.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही प्रेरक कविता है बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  5. शास्त्री जी बिल्कुल सही फरमा रहे हैं -
    चलना ही ज़िंदगी है, रुकना है मौत तेरी!

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर बात कही कविता के माध्यम से.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  7. जीवन का मूलमंत्र तालाब और नदी के माध्यम से बहुत सरलता से समझाया है.....खूबसूरत रचना...आभार

    उत्तर देंहटाएं
  8. jeevan chalne ka naam
    chalte raho subaho shaam

    bas isi ka naam jeevan hai jismein gati hai aur usi ki dhun pa rhum sab bhi chalte rahte hain.........bahut sundar bhav.

    उत्तर देंहटाएं

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